राजनीतिक सामाजिक

भारत में राज करने वाले अंग्रेज़ों को नहीं मिलती थी इंग्लैंड में नौकरी, पर क्यों?

भारत में राज करने वाले अंग्रेज़ों को नहीं मिलती थी इंग्लैंड में नौकरी, पर क्यों?

सामाजिक

बकरा ईद और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

बकरा ईद एक ऐसा त्यौहार जिसमें पैसा, जानवर के खाने के चारे से लेकर, ट्रांसपोर्ट से लेकर, कुर्बान करने का मेहनताना तक, सब गरीब देसी तबके के लोगों के हाथ में जाता है। बकरा बकरी पालन देश का सबसे गरीब तबका और गाँव में रहने वाला वर्ग करता है।यह वो FD है जो हर बकरीद […]

सामाजिक

वक्फ बोर्ड संपत्तियों का संकुचित उपयोग

भारतीय वक्फ प्रबंधन प्रणाली की रिर्पोट है, कि वर्तमान में इनके पास आठ लाख एकड़ से अधिक के कुल क्षेत्रफल को कवर करने वाली 8.54.509 संपत्तियाँ हैं। भारतीय सेना व रेलवे के बाद वक्फ बोर्ड देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार है। शाब्दिक रूप से वक्फ किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी उद्देश्य के लिए किसी […]

सामाजिक

तालमेल तो बिठाना ही होगा……

क़ानूनन रात दस बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाना मना है लेकिन जनता और शासन प्रशासन के आपसी तालमेल से देश में रात रात भर लाउडस्पीकर हर जगह बजता है पता करें कि बड़ी चौपड़ पर होने वाले मुशायरा में जनता और शासन प्रशासन का तालमेल क्यों नहीं बैठा या मुशायरा आयोजित करने वालों में तालमेल […]

सामाजिक साहित्यिक

एक ईरानी लघु फिल्म: जब बाप ने चुराई रोटी….

ग़रीब बाप ने दुकान से रोटी चुराई और लेकर एक तरफ मुड़ गया, दुकानदार जाते जाते उसे रोक लेता है। कंफ्यूज हुई बेटी अपने बाप से पूछती है क्या हुआ ?? बाप परेशान हो जाता है और माफ़ी माँगने के लिए लब खोलता है। होंठ खोलते ही दुकानदार इतना कहता है “बेटी तेरा बाप बचा […]

सामाजिक

आज वह रौनक-ए-बाज़ार नज़र आती हैं

एक वक़्त था जब बुर्क़ा या अबाया पर्दा और हया की अलामत कहलाता था !! फ़िर बुर्के ने सफ़र तय किया और फिटिंग की तंग गलियों व तारीक गलियों से होता हुआ जिस्म के साथ ऐसा चिपकता गया कि अब बुर्के को भी बुर्के की ज़रूरत पड़ गई है !! और अब दौर ए जदीद […]

सामाजिक

पिता का समाज व पुत्रों के नाम पत्र

लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली।चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है। पिता सेना में कर्नल के पद से रिटार्यड हुए । वे लखनऊ के एक पॉश कॉलोनी में […]

सामाजिक

सर झुका कर क्यों ?

लेखक: ग़ुलाम मुस्तफ़ा नई़मी, दिल्लीअनुवादक: मुहम्मद तशहीर रज़ा मरकज़ी, शाहजहांपुर इन दिनों हिंदुओं की लगभग हर रैली, जुलूस, यात्रा में एक गाना ख़ूब बजाया जा रहा है जिसके शब्द हैं;“टोपी वाला भी सर झुका के जय श्रीराम बोलेगा” शायद ही कोई रैली या सभा हो जिसमें यह गाना ना बज रहा हो, अगर यह रैली […]

सामाजिक

जिन्दगी सामने थी और तुम दुनियां मे उलझे रहे

लेखक: जगदीश सिंह, सम्पादक एक दिन शिकायत‌ तुम्हे वक्त से नहीं खुद से होगी! कि जिन्दगी सामने थी और तुम दुनियां मे उलझे रहेे! जीवन चक्र का अनवरत अबाध गति से शनै: शनै: आगे बढ़ते रहना प्रकृति प्रदत्त नियम है! इसमें न कहीं अवरोध है! न बिरोध है!आज के मतलबी संसार में जहां कोई नही […]

सामाजिक

उस्ताद के अदब के फ़वाईद

हुसूले इल्म के बुन्यादी अरकान में से एक अहम रुक्न उस्ताद है , तहसीले इल्म में जिस तरह दर्सगाह व किताब की अहमियत है उसी तरह हुसूले इल्म में उस्ताद का अदब व एहतिराम मर्कज़ी हैसियत का हामिल है ।उस्ताद की ताज़ीम व एहतिराम शागिर्द पर लाज़िम है कि उस्ताद की ताज़ीम करना भी इल्म […]