राजनीतिक

नफरती कौन? उवैसी या सेक्युलर नेता!!

लेखक : मुहम्मद ज़ाहिद अ़ली मरकज़ी (कालपी शरीफ)
चेयरमैन- तहरीक उ़लमाए बुंदेलखंड
सदस्य- रोशन मुस्तक़बिल दिल्ली
अनुवादक : मुहम्मद तशहीर रज़ा मरकज़ी, शाहजहांपुर

भारतीय राजनीति में दो प्रकार के नेता होते हैं: एक नफरत करने वाले, एक प्रेम करने वाले, आमतौर पर सेक्युलर पार्टियों और उनके नेताओं को प्रेमी दल माना जाता है, जबकि नफरती समूह भाजपा या मजलिस-ए-इत्तेहाद-ए-मुस्लिमीन या मुस्लिम नेतृत्व का दावा करने वाले नेताओं को समझा जाता है। लेकिन गहराई में जाने पर प्रेमी दल यानी सेक्युलर पार्टियों में भी दो प्रकार के नफरती गिरोह हैं, एक खुला हुआ और एक छुपा हुआ। जो खुला हुआ गिरोह है वह जब तब मुसलमानों के विरुद्ध टीका टिप्पणी करता रहता है और पार्टी उनके किये धरे पर झाड़ू फेरती रहती है। और जो छुपा हुआ गिरोह है वह मुसलमानों के साथ सहानुभूति का दिखावा करता रहता है। इस प्रकार नफरती समूहों की कुल संख्या चार है इन्ही चारों समूहों के इर्द-गिर्द पूरे भारत की लीडरशिप घूमती नज़र आती है।
आज इस लेख में हम आपके सामने कुछ आंकड़े पेश करेंगे ताकि आप भी नफरती और प्रेमी समूहों के बीच के अंतर समझ सकें और तय कर सकें कि असली नफरती कौन है?
चूंकि दुनिया जानती है कि भाजपा खुलेआम नफरत की राजनीति करती है, तो उसके बारे में बात करना सूरज को चिराग़ दिखाने की तरह है, इसलिए उसको छोड़ देते हैं और उसके विपरीत जनाब असदुद्दीन ओवैसी साहब की मजलिस इत्तिहादुल मुस्लिमीन, बदरुद्दीन अजमल की ए•आई•यू•डी•एफ• (AIUDF) और केरल की

मुस्लिम लीग को नफरत की राजनीति करने वाला जाता है, ख़ैर उन्हेंं भी हटा देते हैं, और देखते हैं कि अन्य तथाकथित सेक्युलर पार्टियां और उनके प्यार करने वाले नेताओं द्वारा कितनी प्रेम की नदियाँ बहती हैं।

__प्रेम की नदियां बहाने वाली पार्टियां!!

किसी शायर ने कहा था कि:
अ़ज़ीज़ इतना ही रखिए कि जी संभल जाए,
प्यार इतना न करिये कि दम निकल जाए।

कांग्रेस : ​​शायद इस शायर के जन्म से पहले ही कांग्रेस ने यह जान लिया था और हमसे इतना प्रेम जताया कि हमारी सांसें ही चली गईं, जैसे बनिया सरसों से तेल निकालने के बाद खली से तेल निकालने का प्रयास करता रहता है उसी प्रकार कांग्रेस भी हमारे साथ करती रही है और आगे भी करती रहेगी। कांग्रेस भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी है, इसलिए सबसे पहले इसका उल्लेख किया जाना चाहिए, कांग्रेस ने मुसलमानों के साथ जितना अपने प्यार को साझा किया है उसका अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता, यह कांग्रेस ही थी जिसने 1952 में मुसलमानों को मिलने वाले आरक्षण को अनुच्छेद 341 में धर्म की शर्त लगा कर समाप्त कर दिया और इस तरह मुसलमानों को आर्थिक रूप से कमजोर करने का पहला काम कांग्रेस ने ही किया, उसने ही मुसलमानों को अपने नेतृत्व को समाप्त करने के लिए कहा और कांग्रेस के दरबारियों ने इसे स्वीकार करके देश के करोड़ों मुसलमानों को गैरों के रहमो-करम पर छोड़ दिया। जब भी कोई मुस्लिम पार्टी उठी तो कांग्रेस ने उसका गला इतने प्यार से घोंटा कि मृतक को भी अपनी मृत्यु का एहसास तीन दिन बाद हुआ कि हमारा काम-तमाम हो गया।
भारत में 55 वर्षों से अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस के दौर में लगभग *50,000 दंगे* हुए हैं, और मुसलमानों को अपनी जान, संपत्ति और सम्मान सब-कुछ खोना पड़ा, कभी ऐसा समय नहीं आया कि जब कांग्रेस को अपने कार्यों पर पछतावा हुआ हो, *बाबरी मस्जिद, हाशिम पुरा, भिवंडी, भागलपुर, नीली (असम) किस हद तक गिनाया जाए। कांग्रेस का यह प्यार भी देखिए कि आज़ादी के बाद मुसलमान नौकरियों मे 30% से घटाकर 1.50% रह गये। कांग्रेस के एहसानों में से एक एहसान यह भी देखते चलें कि NCRB के आँकड़ों के अनुसार देश में मुसलमानों की कुल आबादी 14.2 प्रतिशत है, जबकि जेलों में कुल कैदियों का 16.6 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम समुदाय का है। कांग्रेस ने कभी भी दंगाइयों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की ही नहीं, बल्कि पार्टी में चरमपंथी नेताओं को शामिल करके उनका खामोशी से समर्थन हमेशा करती रही है। महाराष्ट्र में अभी भी शिवसेना से हाथ मिला कर सेक्युलर है, बाबरी मस्जिद पर तो चुप रही लेकिन राम मंदिर पर ख़ूब आनन्दित हुई । फिर भी वे प्रेम के सबसे बड़े पैरोकार हैं और मुस्लिम नेतृत्व का दावा करने वाली सभी पार्टियों और उनके नेताओं को “नफरती” होने का प्रमाण पत्र बांटते फिर रहे हैं।

__समाजवादी पार्टी, प्रेम का संगम है!!

कहने को तो यह पार्टी भी मुस्लिम समर्थक मानी जाती है लेकिन इस पार्टी के सत्ता में रहते हुए भी अन्याय और वादों से मुकरने के अनगिनत रिकॉर्ड हैं। पिछड़े, दलित और मुसलमानों को विकसित करने, विकसित समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने और पिछड़ी जातियों के अधिकारों को दिलवाने के नाम पर स्थापित पार्टी मुसलमानों के लिए दूसरी कांग्रेस ही साबित हुई, 7 से 8 प्रतिशत वोट वाली यह पार्टी लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट लेकर चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची और अपने समाज को ख़ूब फायदा पहुंचाया। हर बार मुसलमानों से केवल वादे किए गए और चुनाव के बाद अगले चुनाव तक इन वादों को भुला दिया गया। इस पार्टी के सत्ता में रहते हुए मुसलमानों पर खूब मुकदमे हुए, नौकरियों के नाम पर वोट तो लिया गया लेकिन नौकरियां मिली कभी नहीं। दंगाइयों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों पर बुलडोजर चलाए गए, मुस्लिम महिलाओं को कब्र से निकालकर बलात्कार करने वाला पार्टी में शामिल है, मुस्लिम युवकों की लिंचिंग या पुलिस हिरासत में मौत पर पार्टी की चुप्पी आदि हर फैसले ने दिखाया है कि मुसलमान उनके लिए सिर्फ एक वोटिंग मशीन हैं और कुछ नहीं।
मुसलमानों के लिए यह पार्टी भी सिर्फ एक छलावा ही साबित हुई। अब इस पार्टी के सर्वोच्च नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी ओवैसी साहब को नफरती घोषित कर रहे हैं। वह सभी पार्टियों के साथ गठबंधन कर रहे हैं लेकिन ओवैसी के साथ नहीं क्योंकि ओवैसी भड़काऊ हैं, सीधी सी बात यह है कि 7 प्रतिशत वाले 20 प्रतिशत वालों को एक लाठी से हांक रहे हैं।

_बहुजन समाज पार्टी!!

इस पार्टी की सर्वोच्च नेता सुश्री मायावती हैं, यह पार्टी प्रसिद्ध दलित नेता कांशीराम की कोशिशों का नतीजा है। उनका नारा भी शोषित वर्ग को ऊपर लाना था। उत्तर प्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत वोट रखने वाली यह पार्टी अगर कांशीराम के सिद्धांतों पर चलती तो आज प्रधानमंत्री इसी पार्टी से होता। उत्तर में प्रदेश में 22 फीसदी दलित और क़रीब 20 फीसदी मुस्लिम हैं, अगर यह एक हो जाएं तो कौन राज कर सकता है? लेकिन बहन जी सिर्फ वोट लेना जानती हैं देना कुछ नहीं जानती, मुसलमानों ने इस पार्टी पर भी ख़ूब भरोसा किया और चार बार मुख्यमंत्री बनाया लेकिन यहां भी कहानी वही रही, जीतकर कभी कुछ दिया नहीं, लेकिन जब हारे तो आरोप लगाया गया कि मुसलमानों ने वोट नहीं दिया। *तीन बार बीजेपी से मिलकर सरकार बनाने वाली बहन जी को भी ओवैसी साहब नफरती लगते हैं* और मुख्तार अंसारी गुंडा दिखते हैं, इन्हें भी मुस्लिम नेतृत्व स्वीकार नहीं, पिछले सात वर्षों से भाजपा के अधिकांश कानूनों का पूरा समर्थन करती रही हैं। बहन जी मुसलमानों को कट्टरपंथी मानते हुए अपना वोट भी भाजपा जैसी सेक्युलर पार्टी को ट्रांसफर करा देती हैं, लेकिन प्यार का यह हाल है कि पार्टी के एकमात्र नेता श्री नसीम-उद्दीन सिद्दीकी आज इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं, और इस पार्टी ने भी कभी मुसलमानों को कुछ नहीं दिया।

_नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और ममता बनर्जी!!

जनता दल यूनाइटेड : नीतीश कुमार इस पार्टी के नेता हैं और वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री हैं, भाजपा के पुराने सहयोगी हैं, उनके समर्थन से दूसरी बार सरकार में हैं, हैरानी की बात यह है कि मुसलमान अभी भी नीतीश कुमार को सेक्युलर ही जानते हैं, जबकि पिछली सरकार में लिंचिंग के साथ-साथ दंगे-फसाद भी चरम पर पहुंच चुके थे और अब बिहार विधानसभा में “वंदे मातरम” गाया जाना और बिहार में भी खुले में नमाज़ पढ़ने को लेकर विवाद खड़ा होना, सब स्पष्ट हो गया है कि जे•डी•यू• कितनी सेक्युलर है!।

राष्ट्रीय जनता दल : यह श्री लालू प्रसाद यादव की पार्टी है, उन्होंने बिहार चुनाव में मजलिस से हाथ नहीं मिलाया क्योंकि उन्हें मुस्लिम वोट तो पसंद हैं लेकिन मुस्लिम पार्टी नहीं, परिणाम ! सत्ता से दूर हैं। वह नीतीश कुमार या कांग्रेस से उतने नाराज नहीं हैं जितने ओवैसी साहब से हैं। लालू प्रसाद यादव को भी मुसलमान कई बार मुख्यमंत्री बना चुके हैं, लेकिन नौकरियों में जगह नहीं मिली, न कोई उम्मीद है। मुसलमान सिर्फ इसलिए लालू यादव से खुश हैं कि उन्होंने एक बार आडवाणी का रथ रोक दिया था, मुसलमान यह समझने को तैयार नहीं हैं कि लालू जी ने सिर्फ आडवाणी का रथ ही नहीं रोका बल्कि मुसलमानों को नौकरियों और सियासत से भी रोक रखा है। मुसलमानों को कुछ मिले या न मिले ये उनके साथ ही डटे रहेंगे। यादव समाज कहां से कहां पहुंच गया और मुसलमान झंडा उठाते हुए दरी ही बिछा रहा है।

तृणमूल कांग्रेस : ममता दीदी इस पार्टी की नेता हैं और हर काले सफेद की मालकिन हैं। हमने बंगाल चुनाव में उनके तेवर भी देखे हैं। दीदी भाजपा से उतनी नाराज नहीं थीं जितनी वह ओवैसी साहब से थीं। बंगाल में मुसलमान लगभग 30 प्रतिशत हैं मतलब सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन बंगाल के मुसलमान जितने पिछड़े हैं, पूरे भारत में इतने पिछड़े नहीं हैं। फिर भी ममता हीरो हैं ओवैसी जीरो हैं। यह दीदी का प्यार ही है कि सैकड़ों की संख्या में मुस्लिम लड़कियों को सरकारी नौकरी के लिए होने वाली परीक्षा में शामिल नहीं होने दिया गया क्योंकि उन्होंने हिजाब पहने हुए तस्वीरें खिंचवाकर नौकरी के लिए आवेदन किया था। बंगाल में भी सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की वही स्थिति है जो पूरे देश में सेक्युलर पार्टियों ने मुसलामानों की कर रखी है। यह कैसी मोहब्बत है कि हमें आगे बढ़ने भी नहीं दिया जाता और किसी को लीडर भी नहीं मानने दिया जाता, अगर यह मुसलमानों से प्यार है तो फिर नफ़रत क्या है? मुसलमानों इसी को छुपी हुई नफ़रत कहा जाता है।

__अल्लाह बचाए! ऐसी मोहब्बत करने वालों से…

नफरती लोग दो प्रकार के हैं एक का काम तो पहले दंगा भड़काना या दंगाइयों का साथ देना होता है यह बाहर से प्रेमी और भीतर से नफरती होते हैं। दूसरे प्रकार के लोग दंगाइयों के मामलों को कोर्ट तक पहुंचने नहीं देते‌ अगर पहुंच जायें तो अदालत में टिकने नहीं देते, यह भी बहुत सेक्युलर और प्रेमी होने का दावा करते हैं।
एस•पी•, बी•एस•पी•, आर•जे•डी•, जे•डी•यू•, एन•सी•पी•, टी•एम•सी• या और कोई सेक्युलर पार्टी सबके सब भाजपा से केंद्र या राज्य स्तर पर गठबंधन कर चुकी हैं, कुछ पार्टियां तो कई बार यह खेल खेल चुकी हैं। (इसके बावजूद ये पार्टियां मुसलमानों की नज़र में सेक्युलर हैं, और जिसने कभी भाजपा से हाथ नहीं मिलाया बल्कि सड़क, टीवी डिबेट से लेकर सांसद तक हर मोर्चे पर भाजपा का विरोध किया, वह भाजपा का एजेंट लगता है) इन सभी पार्टियों को भाजपा नफरती नहीं लगती, उवैसी नफरती लगते हैं इसलिए उवैसी से गठबंधन नहीं करते। अब आप समझ सकते हैं कि इन्हें दुश्मनी मुस्लिम लीडरशिप से है या बीजेपी से?
ये दोनों प्रकार सिर्फ सेक्युलर कहलाने वाली और हमारे प्यार का दम भरने वाली पार्टियों में ही पाए जाते हैं, अब यह आप पर निर्भर करता है कि आपको ऐसे प्रचंड प्रेमियों को और कितना सहन करना है या फिर अपने नेतृत्व (अपनी लीडरशिप) की छाया में अपना और अपने बच्चों का भविष्य उज्जवल करना है।

मैं अपनी बात मौलाना शाहिद अली मिस्बाही की इस बात पर ख़त्म करना चाहूँगा वो लिखते हैं “कमाल की बात तो यही है कि जिस समाज ने कभी बीजेपी को वोट नहीं किया उसी से कहा जाता है कि तुम बीजेपी को हराओ! जब कि खुद उनका समाज बीजेपी को वोट कर रहा है खेल समझने की ज़रूरत है।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *