- हाईकोर्ट आदेश की अवहेलना, योगदान न देने और अनुशासनहीनता के आरोपों के बावजूद कैसे मिला सेवा लाभ?
जौनपुर।
मदरसा कुरानिया गोपालापुर शहरी से जुड़ा एक पुराना दस्तावेज सामने आने के बाद मदरसा प्रशासन और विभागीय कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दस्तावेज के अनुसार मदरसा प्रबंधन ने सहायक अध्यापक (आलिया) अब्दुल हक खाँ के विरुद्ध हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना, विभागीय निर्देशों की अनदेखी, मदरसे में योगदान न देने तथा अनुशासनहीनता जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश जारी किया था। दिलचस्प बात यह है कि वर्षों बाद वही शिक्षक सेवानिवृत्त होकर पेंशन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
प्रबंधन द्वारा जारी बर्खास्तगी आदेश में दावा किया गया था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2 दिसंबर 2016 के आदेश के बाद आदमपुर अकबर शाखा में कार्यरत शिक्षकों को मदरसा कुरानिया गोपालापुर शहरी में योगदान देना था। आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण, रजिस्ट्रार मदरसा परिषद तथा जिलाधिकारी जौनपुर तक ने विभिन्न स्तरों पर निर्देश जारी किए, लेकिन संबंधित शिक्षक ने कथित रूप से उनका पालन नहीं किया।
प्रबंधन ने अपने आदेश में यह भी आरोप लगाया था कि शिक्षक ने कई नोटिसों की अनदेखी की, नियुक्ति संबंधी अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए और अमान्य घोषित शाखा में कार्य करने का दावा करते रहे। इन आरोपों को आधार बनाकर मजलिसे इंतजामिया ने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने का निर्णय लिया था।
अब वर्षों बाद यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि जिस शिक्षक के विरुद्ध इतनी गंभीर टिप्पणियां दर्ज की गई थीं, वे वर्तमान में सेवानिवृत्त होकर पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ रहे हैं। यदि बर्खास्तगी आदेश विधिसम्मत और प्रभावी था तो उसके बाद उनकी सेवा स्थिति क्या रही? क्या विभाग ने प्रबंधन की कार्रवाई को मान्यता दी थी? यदि नहीं, तो बर्खास्तगी आदेश का अंतिम परिणाम क्या हुआ? और यदि शिक्षक लगातार सेवा में बने रहे, तो प्रबंधन द्वारा लगाए गए आरोपों की विभागीय जांच का निष्कर्ष क्या निकला?
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पूर्व विधायक नसीम अहमद द्वारा की गई शिकायत के आधार पर अब्दुल हक खाँ की नियुक्ति, सेवा अभिलेखों एवं अन्य संबंधित तथ्यों की जांच भी चल रही है। सूत्रों के अनुसार शिकायत में नियुक्ति प्रक्रिया और सेवा संबंधी विभिन्न बिंदुओं पर प्रश्न उठाए गए हैं, जिनकी विभागीय स्तर पर समीक्षा की जा रही है। ऐसे में एक ओर जहां शिक्षक के विरुद्ध पूर्व में जारी बर्खास्तगी आदेश सवालों के घेरे में है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान में चल रही जांच ने पूरे प्रकरण को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
शिक्षा एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि किसी भी शिक्षक को पेंशन का लाभ तभी मिलता है जब उसकी सेवा को विभागीय अभिलेखों में मान्य माना गया हो। ऐसे में यह प्रकरण केवल एक बर्खास्तगी आदेश तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि इसके पीछे हुई प्रशासनिक और विभागीय कार्यवाहियों की भी समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि प्रबंधन के आरोप सही थे, तो उन पर अंतिम निर्णय क्या हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। वहीं यदि आरोपों के बावजूद शिक्षक को सेवा लाभ और पेंशन प्राप्त हुई, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किस स्तर पर बर्खास्तगी आदेश निष्प्रभावी हुआ या निरस्त माना गया।
इस पुराने दस्तावेज के सामने आने और पूर्व विधायक नसीम अहमद की शिकायत पर चल रही जांच के बाद जौनपुर के चर्चित मदरसा प्रकरण में एक बार फिर नई बहस शुरू हो गई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विभागीय अभिलेख, न्यायालयी आदेश, प्रबंधन की कार्रवाई तथा वर्तमान जांच के निष्कर्षों के बीच मौजूद कथित विरोधाभासों पर संबंधित अधिकारी क्या स्पष्टीकरण देते हैं। यदि जांच में नए तथ्य सामने आते हैं, तो यह मामला केवल एक बर्खास्तगी आदेश तक सीमित न रहकर मदरसा प्रशासन और विभागीय जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बन सकता है।


