धार्मिक

बयान-ए-रमज़ान (क़िस्त 01)

रमज़ान रम्ज़ से बना है जिसके मायने हैं जलाना चुंकि ये महीना भी मुसलमानों के गुनाहों को जला देता है इसलिये इसे रमज़ान कहा गया या रम्ज़ का एक मायने गर्म जमीन से पांव जलना भी है चुंकि माहे रमज़ान में मुसलमान अपने नफ़्स को भी जलाता है इसलिए ये नाम पड़ा या रमज़ान गर्म पत्थर को भी कहते हैं चुंकि जब इस महीने का नाम रखा गया वो मौसम भी सख्त गर्मी का था।
📕 गुनियतुत तालेबीन,जिल्द 2,सफह 5

उम्मत का इस बात पर इज्माअ है कि रमज़ानुल मुबारक तमाम महीनों में अफज़ल है,फुक़्हा फरमाते हैं कि जिस तरह हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम के 12 बेटों में हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम अपने वालिद को सबसे ज़्यादा प्यारे थे उसी तरह 12 महीनों में रमज़ानुल मुबारक अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को सबसे ज़्यादा महबूब है,और जिस तरह हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम की बरकत से उनके 11 भाईयों की खतायें माफ हुईं और मौला ने उन्हें बख्शा उसी तरह रमज़ानुल मुबारक की बरकत से भी मुसलमानों के 11 महीनों के गुनाह माफ होंगे और मौला उसके सदक़े में मुसलमानों की बख़्शिशो मगफिरत फरमायेगा इनशा अल्लाह तआला।
📕 नुज़हतुल मजालिस,जिल्द 1,सफह 136

जैसा कि एक हदीसे पाक में भी आता है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जिसने रमज़ान पाया और अपनी बख्शिश ना करा सका वो हलाक हुआ, मतलब ये कि अगर चे मुसलमानों से 11 महीनों में बेशुमार गुनाह होते हैं लेकिन अगर उन्हें रमज़ानुल मुबारक मयस्सर आये तो उसकी ताज़ीम और उसका हक़ अदा करके मौला तआला को राज़ी किया जा सकता है और अपनी बख्शिश कराई जा सकती है तो अब अगर किसी को रमज़ानुल मुबारक मिले और वो रोज़ा छोड़ता रहे नमाज़ क़ज़ा करे ज़कातो फ़ित्रा खुद खा जाये गुनाहों में उसी तरह मुलव्विस रहे तो फिर उसके हलाक़ होने में क्या बाकी रहा।
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 97

रमज़ानुल मुबारक का रोज़ा 10 शव्वाल 2 हिजरी में फर्ज़ हुआ।
📕 खज़ाईनुल इरफान,सफह 42

इस उम्मत में सबसे पहले आशूरह का रोज़ा फर्ज़ हुआ फिर अय्यामे बैद के रोज़े यानि हर महीने की 13-14-15 के रोज़ों से उसकी फर्ज़ियत मंसूख हुई फिर जब रमज़ान का रोज़ा फर्ज़ हुआ तो अय्यामे बैद की भी फर्ज़ियत मंसूख हुई।
📕 तफ़्सीरे अहमदी,सफह 57

दीगर अम्बिया-ए किराम भी रोज़े रखा करते थे अगर चे इसमें इख्तिलाफ़ है कि ये रोज़ा उन पर फर्ज़ था या नहीं जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम अय्यामे बैद के रोज़े रखते थे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम आशूरह का रोज़ा रखते थे हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम हमेशा रोज़ा रखते थे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ईदुल फित्र और ईदुल अज़्हा को छोड़कर हमेशा रोज़ा रखते थे हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम एक दिन छोड़कर रोज़ा रखते हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम हर महीने की शुरू और बीच और आखिर में 3-3 रोज़ा रखते हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हर महीने में 3 दिन रोज़ा रखते हज़रत ज़ुलक़िफ्ल अलैहिस्सलाम हमेशा दिन में रोज़ा रखते और तमाम रात जागकर इबादत करते हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम हमेशा रोज़ा रखते।
📕 तफ़्सीरे अहमदी,सफह 57
📕 तफ़्सीरे खाज़िन,जिल्द 4,सफह 203
📕 तफ़्सीरे जुमल,जिल्द 3,सफह 142
📕अल्बिदाया,जिल्द 1/2,सफह 118/19

रमज़ानुल मुबारक के बाद तमाम नफ्ली रोज़ों में सबसे अफज़ल अरफा यानि 9वी ज़िलहज का रोज़ा है_
📕फतावा रज़वियह,जिल्द 8,सफह 442

والله تعالیٰ اعلم بالصواب

लेखक: क़ारी मुजीबुर्रह़मान क़ादरी शाहसलीमपुरी– बहराइच शरीफ यू०पी०
मदरसा ह़नफिया वारिसुल उलूम क़स्बा बेलहरा ज़िला बाराबंकी यू०पी०

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