राजनीतिक सामाजिक

तेल का खेल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस दिन कच्चे तेल की कीमत में कमी दर्ज होती है, उस दिन भारतीय कंपनियां तेल का दाम घटाती नहीं, सर्फ बढ़ोतरी रोक देती हैं। मीडिया इसे “बड़ी राहत” लिखता है।

पिछले 28 दिनों में ही पेट्रोल 8.85 रुपये प्रति लीटर महंगा हो चुका है। इस तरह डीजल बीते 30 दिनों में 9.80 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ।

यूपीए के वक़्त जब कच्चे तेल की 112 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर थी तब पेट्रोल की कीमत 65.76 रुपये थी।

आज कच्चा तेल 82 डॉलर प्रति बैरल है और पेट्रोल 121 रूपये तक में बिक रहा है।

यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम 19 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गए तब भी सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाया और दाम कम नहीं होने दिया।

इस वक़्त केंद्र सरकार एक लीटर पेट्रोल पर 32.9 रुपए उत्पाद शुल्क वसूलती है। 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 9.48 रुपये प्रति लीटर था। राज्य सरकारें अपने स्तर पर ड्यूटी वसूलती हैं।

जाहिर है कि तेल जनता की जेब काटने का हथियार बन चुका है। सरकार और कंपनियां बेतहाशा मुनाफा उड़ा रही हैं और जनता का तेल निकल रहा है। चूंकि सरकार इस पर न कोई नियंत्रण लगा रही है, न वसूली कम कर रही है, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय कीमतें अब बढ़ रही हैं, इसलिए संभावना जताई जा रही है कि पेट्रोल 150 के भी पार जा सकता है।

जिन्हें शेर पालने का बहुत शौक है, वे कुछ दिनों में पेट पालने लायक भी नहीं बचेंगे और तब उन्हें एहसास होगा कि जो शेर उन्होंने पाला वह तो कागजी था!

  • कृष्णकांत जी के वाल से साभार

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