कविता

नात ए रसूल

फ़ैसल क़ादरी गुन्नौरी

आँख जो दीदार की उन के तमन्नाई ना हो
या ख़ुदा उस आँख में बहतर है बीनाई ना हो

जिस में उन के इश्क़ का डेरा नही वो दिल ही क्या
सर ही क्या है जो शहे वाला का सौदाई ना हो

उन की मिदहत से रहे ग़ाफ़िल ज़ुबाँ जिस दिन मिरी
या ख़ुदा उस दिन ज़ुबाँ में ताब ए गौयाई ना हो

मेरा दावा है जहाँ में कोई भी ऐसा नहीं
भीक जिस ने सरवर ए कोनैन से पाई ना हो

गरचे आसी हूँ मगर हूँ नाम लेवा आपका
मेरे आक़ा रोज़ ए महशर मेरी रुसवाई ना हो

ये ज़मीन ओ आस्मां जिन्न ओ बशर बिल्कुल ना हों
रब को जो मक़सूद उन की जलवा आराई ना हो

माल ओ दौलत, जाह ओ हश्मत सब यहीं रह जायेंगे
ज़िक्रे अहमद करे अरे दुनिया का शैदाई ना हो

वक़्त ए मुश्किल जब कभी फ़ैसल पुकारा है उन्हें
ऐसा देखा ही नहीं उन की मदद आई ना हो

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