गोरखपुर

गोरखपुर: 14 साल के अब्दुर्रज़्ज़ाक बने हाफ़िज़-ए-क़ुरआन

गोरखपुर। इस्लामनगर दिलपोखरा गोरखनाथ के रहने वाले 14 साल के अब्दुल रज़्ज़ाक ने पूरा क़ुरआन-ए-पाक याद कर लिया है। बरकाती मकतब पुराना गोरखपुर, गोरखनाथ में तालीम हासिल कर रहे अब्दुल रज़्ज़ाक ने हाफ़िज़ रज़ी अहमद बरकाती की देखरेख में क़ुरआन-ए-पाक हिफ़्ज़ किया। इस खुशी के मौके पर रविवार को मकतब में मीलाद की महफिल हुई। अब्दुल को तोहफा व सभी की दुआ मिली।

मुख्य वक्ता मुफ्ती मो. अज़हर शम्सी (नायब काजी) ने कहा कि इल्म जिंदगी है, जहालत मौत है इसलिए इल्म की रोशनी से जहालत को दूर किया जाए। मुसलमानों को मौजूदा हालात से घबराने की जरूरत नहीं है। क़ुरआन की रस्सी को मजबूती से पकड़ो, क्योंकि क़ुरआन में हर तरक्की का रास्ता मौजूद है। कोई भी इंसान रसूल-ए-पाक हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही वसल्लम के बताए रास्ते पर चलकर दुनिया और अाख़िरत की कामयाबी हासिल कर सकता है। हमें क़ुरआन व हदीस को पढ़ने के बाद उस पर अमल भी करना चाहिए क्योंकि अमल के बगैर इल्म बेकार है।

हाफ़िज़ रज़ी अहमद बरकाती ने कहा कि मुसलमानों की सही रहनुमाई के लिए क़ुरआन-ए-पाक के बाद सबसे कीमती विरासत रसूल-ए-पाक की हदीसें हैं। मुसलमानों को चाहिए कि वह अपनी जिंदगी रसूल-ए-पाक की सुन्नतों पर चलकर गुजारें। अपने बच्चों को हाफ़िज़-ए-क़ुरआन और आलिम-ए-दीन बनाएं।

इस मौके पर अब्दुल के पिता डॉ. औरंगजेब अशरफी, मौलाना इसहाक, कारी मो. अनस रज़वी, हाफ़िज़ फ़रहान, कारी अफजल बरकाती, मो. हाशिम, शाहिद उर्फ राजू, हाफ़िज़ आरिफ, हाफ़िज़ अज़ीम अहमद आदि मौजूद रहे।

शोऐब रज़ा

विश्व प्रसिद्ध वेब पोर्टल हमारी आवाज़ के संस्थापक और निदेशक श्री मौलाना मोहम्मद शोऐब रज़ा साहब हैं, जो गोरखपुर (यूपी) के सबसे पुराने शहर गोला बाजार से ताल्लुक रखते हैं। वे एक सफल वेब डिजाइनर भी हैं। हमारी आवाज़

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