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ज़्यादा तलाक़ें क्यों होती हैं। ??

लेखक: मह़मूद रज़ा क़ादरी, गोरखपुर

ज्यादा त़लाक़ की मसलें जाहिर हैं मगर जबकि गौर व फिक्र किया जाए!

ज़बान दराज़ी
वह आफत है जिसके सबब अच्छे भले खानदान तबाह व बर्बाद हो जाते हैं खासकर आज की नई नस्ल में बर्दाश्त की कमी की वजह से इसका ध्यान बहुत ज्यादा बढ़ता जा रहा है।
यह एेसी आदत है जिसके सबब जल्द ही नाईत्तफाकी बदगुमानी नफरत पैदा हो जाती है फिर मुकाबला शुरू हो जाता है और नतीजा लड़ाई फसाद खून रेजी़ तक जा पहुंचता है आखिरकार रिश्तो को खत्म करना ही आखिरी हल समझा जाता है।

मोबाइल फोन
मोबाइल जितना औरतों के लिए खतरनाक है उतना मर्दों के लिए नहीं अगर चे मां-बाप को पता होता है कि मोबाइल चलाने वाली घर के कामकाज से आर (तकलीफ)होती है उसको घर का काम सबसे बड़ा बोझ लगता है उनके घर में नौकरानी आकर कामकाज करती हैं जिसके सबब गरीबी मुफलिसी के दिन जल्द जाहिर होने लगतें हैं ।
शौहर और बीवी की आपस में ना इत्तफाकी दिन-ब-दिन नफरत में बदलती जाती है फिर एक दूसरे में दिलचस्पी काफी हद तक खत्म हो जाती है फिर बद गुमानी पैदा होती हैं आए दिन फसाद शरारत बेचैनी दोनों तरफ से बढ़ना शुरू हो जाती हैं। आखिरकार घर टूट जाता है मोबाइल वाली औरतों के बच्चे को बाप पालते हैं बेचारे थके हारे आते हैं उनको घर पर सुकून की बजाय ऐसा लेक्चर मिलता है कि वह जिंदगी से बेजा़र (ना उम्मीद) हो जाते हैं आहिस्ता आहिस्ता यह सब असर औलाद पर पड़ता है ऐसे लोगों की औलाद निकम्मी बन जाती है फालतू काम उनका मकसद बन जाता है यह बातें हर घर में हर कबीले में तकरीबन बराबर नजर आती हैं मगर कोई घर का बड़ा सरदार सोचना तक गवारा नहीं करता बल्कि ऐसे हालात में किसी बड़े को औरतें बड़ा कम ही समझती हैं लेकिन हमारे यहां औरत के घर के घर बैठने का सबब कुछ और है।

👉🏻हर छोटी बड़ी बात मां और बहनों तक पहुंचाई जाती है फिर वहां से अजीब और गरीब मशवरे आना शुरू होते हैं जिसके सबक फसाद बढ़ता ही रहता है।
👉🏻मोबाइल फोन के जरिए मिलने वाली तरबियत से औरत का घर सब कुछ तबाह व बर्बाद हो जाता है औरत चाहती है जैसे मैं चाहुं वैसे ही सब कुछ घर में हो मेरी ही हुकुम रानी चले
👉🏻मर्द चाहता है मैं ही सरबराह हूं मेरी मर्जी चलेगी आखिरकार नफरत फसाद लड़ाई जुदाई पर बात पहुंच जाती है फिर तो घर वाले भी आसूदा हो जाते हैं इतनी टेंशन बढ़ जाती है कि औरत का रिश्ता खत्म करके घर बैठाया जाता है।
फिर मां बहन को पश्चातावे के सेवा कुछ हासिल नहीं होता

अब जब औरत अपनी मां के घर आ जाती है तब उसे अक्ल आती है कि मैंने गलत किया मेरी ही ज्यादा गलतियाँ हैं और तो मैंने अपने घर वालों को बता कर अपना कर तबाह कर दिया घर वाले भी लोगों के ताने सहते हैं दूसरा रिश्ता जैसा तैसा मिले दे दे आखिर यही सोच बन जाती है कि या तो लड़की काफी सालों तक बैठी रहती है अगर खुद कमाने वाली हो तो यही समझती है कि मेरी असली जिंदगी यही है मगर कुछ सालों के बाद उसे एहसास होता है कि जिन्दगी में हमसफर का होना जरूरी है।

वह हर बात हर कैफियत किसी बता नहीं सकती अब न तो बहनों के पास वक्त होता है ना भाईयों के लिए काबील तवज्जो होती है।
औरत अपने भाइयों का फख्र होती है और मां बाप कि मान व एतमाद (भरोसा) होती है बहन कि इज्ज़त होती है इसलिए अपनी इज्ज़त व पाकीजगी को दागदार नहीं कर सकती
मगर कुछ औरतें गैर लोगों से रिश्ते निभाकर भाई के उम्मीद बाप के भरोसे मां के मान बहन की इज्जत को मिट्टी में मिला रही होती है जब रिश्ता टूट जाता है तब औरत को अक्ल आती है कि घर की हर बात बहन को बताने की नहीं होती घर की हर बात मां तक पहुंचाने की नहीं होती मगर उस वक्त बहुत देर हो चुकी होती हैं

घरवालों की ज्यादा दखलंदाजी
आप खुद सोचे जब घरवाले ज्यादा दखलअंदाजी करेंगे तो घर कैसे चलेगा औरतों को तो सपोर्ट मिलेगी वो और ज्यादा हिम्मत करेगी हर बात घरवालों को औरत तब तक करती हैं जब उसकी बहन मां भाई व बाप उसकी हर शिकायत को सीरियस लेते हैं और उसको भड़कातें हैं तो बेचारे यही समझते हैं कि हमारी बहन बेटी के साथ सच में नाइंसाफी और जुल्म हो रहा है वह बेचारी सिर्फ (एक्सेल) से धुली खामोश शरीफ मज़लूम है बस जुल्म ही सहती रहती है।
घर वाले कभी भी यह सोचना गवारा नहीं करते कि घर में झगड़े का सबब जी मेरी बहन भी तो हो सकती है आप अब तक बेचारे बहनोई को ही जालिम समझते व अपने गुमान में बर्दाश्त करते आ रहे हैं क्या ही अच्छा होता जो अपने बहनोई व दामाद से भी दास्ताने दर्द सुन लेते और वक्त पर ही अपनी बहन बेटी को हिदायत और तलकीन करके सही रास्ते पे लाते
कुछ अच्छे घर वाले भी होते हैं जो अपनी बहन बेटी का साथ देने के बजाय अपने अपने बहनोई और दामाद का साथ देते हैं उसे मोहब्बत देकर अपने भरोसे ले लेते हैं।
ताकि सारी लड़ाइयां खत्म हो जाएं
बहुत सी औरतें तो अपने शौहर के घर को ही अपना घर समझती हैं कुछ भी हो जाए सब्र और बर्दाश्त से काम लेती हैं खिदमत और फरमाबरदारी के जरिए सब घर वालों के दिल में अपनी इज्जत और मकाम जल्द ही बना लेती हैं।

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6• गीबत की तबाह कारीयां
7• जन्नत की दो चाबियां

शोऐब रज़ा

विश्व प्रसिद्ध वेब पोर्टल हमारी आवाज़ के संस्थापक और निदेशक श्री मौलाना मोहम्मद शोऐब रज़ा साहब हैं, जो गोरखपुर (यूपी) के सबसे पुराने शहर गोला बाजार से ताल्लुक रखते हैं। वे एक सफल वेब डिजाइनर भी हैं। हमारी आवाज़

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