राजस्थान

भारत की आज़ादी में मुसलमानों के योगदान को भुलाना नामुमकिन

  • भारत की आज़ादी में इस्लाम के मानने वालों का बहुत बड़ा योगदान है। मुस्लिम उलमा और मुस्लिम योद्दधाओं के बलिदानों को हर लम्हा, हर पल हमें याद रखना चाहिएः जीएएफ़ प्रमुख, मोहम्मद सैफुल्लाह

जयपुर । ग़ौसे आज़म फाउंडेशन (जीएएफ़) प्रमुख राष्ट्रप्रमी हज़रत मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी ने देशवासियों को 75वें स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं देते हूए कहा कि भारत की आज़ादी में उलमा-ए-किराम, मुस्लिम योद्दधाओं और आम मुसलमानों के बलिदानों का ज़िक्र किया और कहा कि साल 1947 की जंग में हमें आज़ादी मिली। देश के लिए उलमा-ए-किराम, मुस्लिम योद्दधाओं और आम मुसलमानों के बलिदानों को कैसे भूलाया जा सकता है।

जीएएफ़ प्रमुख हज़रत मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी ने कहा कि 1857 में भी जंग हुई थी। भारत की आज़ादी में मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है। देश के उलमा-ए-किराम और देश के मुस्लिम योद्दधाओं के बलिदानों को हर लम्हा, हर पल हमें याद रखना चाहिए। सिराजुद्दौला, टीपू सुल्तान, अनवर अली खान, मुराद अली खान, अल्लामा फ़ज़ले हक़ ख़ैरादाबादी, तुर्रेबाज़ खान, खुदा बख्श, मौज खान, भटक मियां अंसारी, आबेद हसन, उमर सुबहानी, अल्लाह बख़्श, ज़ाकिर हुसैन आदि के बलिदानों को कैसे भूलाया जा सकता है।

जीएएफ़ प्रमुख हज़रत मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी ने कहा कि आज चाहे सत्ताधारी पार्टी हो या विपक्ष की पार्टियां। ये अपने किसी प्रोग्राम में भी देश के उलमा-ए-किराम और देश के मुस्लिम योद्दधाओं के बलिदानों का ज़िक्र तक नहीं करते हैं, जो देश को आज़ाद कराने के लिए अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लड़े थे। पिछले 75 सालों से ये सिर्फ़ मुसलमानों के खिलाफ़ नफ़रत फैला रहे हैं। इन्हें इतिहास को अच्छी तरह जानना और पढ़ना ज़रूरी है। इक्का दुक्का कोई ज़िक्र कर दे तो इसे सिर्फ़ अपवाद ही कहा जा सकता है।

जीएएफ़ प्रमुख हज़रत मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी ने कहा कि अंग्रेज़ो का साथ ग्वालियर के सिंधिया परिवार ने दिया था, जो झांसी की रानी के खिलाफ़ और अंग्रेजों के साथ लड़ाई लड़ने आए थे। झांसी की रानी के साथ जो महिला थी, वह भी मुसलमान ही थी। वह मुस्लिम महिला भी देश के लिए शहिद हो गई। नफ़रत फैलाने वाले कहते हैं कि देश के बंटवारे के लिए मुसलमान ज़िम्मेदार हैं। मुसलाम बंटवारे का ज़िम्मेदार नहीं है। उस समय वोट डालने का अधिकार सभी को नहीं था। जिनको पाकिस्तान से प्यार था, वे लोग पाकिस्तान चले गए और जिनको भारत से प्यार था, वे भारत में ही रहना पसंद किया। उनकी नस्लें भी भारत में रहना ही पसंद करती हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में छपी किताब पढ़ो, सब सच सामने आ जाएगा लेकिन जिनके पास डिग्री नहीं है, वे कभी नहीं पढ़ पाएंगे और जिनके पास व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की डिग्री है, वे भी कैसे पढ़ पाएंगे? वहां तो सिर्फ नफ़रत ही परोसा जाता है।

जीएएफ़ प्रमुख हज़रत मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी ने कहा कि देश तो आज़ाद हो गया मगर नफ़रतों के सौदागरों ने देश में इस्लामोफोबिया फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। इसलिए देश का मुसलमान अपने ही देश में अपने आपको असुरक्षित महसूस करने लगा है। यहां सबसे ज्यादा इस्लाम व पैग़म्बर पर आपत्तिजनक बयान देकर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया जाता है। यहां सबसे ज्यादा ज़ुल्म व सितम मुसलमानों पर ही हो रहा है और सरकारी व ग़ैर सरकारी स्तर पर सबसे ज्यादा मुसलमानों को ही नज़र अंदाज किया जा रहा है। देश के मुसलमानों को आज के वर्तमान हालात में हिम्मत और हौसलों को मज़बूत रखना होगा और अपने ह़क़ के लिए ख़ुद ही लड़ना होगा और संकल्प लेना होगा कि…

गुल्शने हिन्द को शोअलों से बचाना होगा!
आतिशे बुग़्ज़ व अदावत को बुझाना होगा! !
जश्ने आज़ादी हक़ीक़त में मनाने के लिए!
प्यार का दीप, हर एक दिल में जलाना होगा! !

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