मसाइल-ए-दीनीया

तरावीह का बयान (क़िस्त 6)

मसअला
ये जाइज़ है कि एक शख़्स इशा व वित्र पढ़ाए दूसरा तरावीह, जैसा कि हज़रत उमर रज़िअल्लाहू तआला अन्ह इशा व वित्र की इमामत करते थे और उबई बिन कअब रज़िअल्लाहू तआला अन्ह तरावीह की।
📚आलमगीरी

मसअला
अगर सब लोगों ने इशा की जमाअत तर्क कर दी तो तरावीह भी जमाअत से ना पढ़ें हां इशा जमाअत से हुई और बअज़ को जमाअत न मिली तो ये जमाअते तरावीह में शरीक हों।
📚दुर्रे मुख़्तार

मसअला
अगर इशा जमाअत से पढ़ी और तरावीह तन्हा तो वित्र की जमाअत में शरीक हो सकता है अगर इशा तन्हा पढ़ ली अगरचे तरावीह बा जमाअत पढ़ी तो वित्र तन्हा पढ़े।
📚दुर्रे मुख़्तार,
📚रद्दुल मोहतार

मसअला
इशा की सुन्नतों का सलाम ना फेरा उसी में तरावीह मिलाकर शुरू की तो तरावीह नहीं हुई।
📚आलमगीरी

मसअला
तरावीह बैठकर पढ़ना बिला उज़्र मकरूह है बल्के बअज़ों के नज़दीक तो होगी ही नहीं।
📚दुर्रे मुख़्तार

मसअला
मुक़्तदी को ये जाइज़ नहीं के बैठा रहे जब इमाम रुकू करने को हो तो खड़ा हो जाए के ये मुनाफ़िक़ीन से मुशाबहत है अल्लाह अज़्ज़ा व जल्ल इरशाद फ़रमाता है:
(तर्जुमा) मुनाफ़िक़ जब नमाज़ को खड़े होते हैं तो थके जी से।
📚 ग़ुनियह, वगैरह

मसअला
इमाम से ग़लती हुई कोई सूरत या आयत छूट गई तो मुस्तहब ये है के उसे पहले पढ़ कर फिर आगे बढ़े।
📚आलमगीरी

मसअला
दो रकअत पर बैठना भूल गया खड़ा हो गया तो जब तक तीसरी का सजदा ना किया हो बैठ जाए और सजदा कर लिया हो तो चार पूरी कर ले मगर ये दो शुमार की जाएंगी और जो दो पर बैठ चुका है तो चारों हुईं।
📚आलमगीरी

मसअला,
तीन रकअत पढ़कर सलाम फेरा अगर दूसरी पर बैठा ना था तो ना हुई उनके बदले की दो रकअत फिर पढ़े।
📚आलमगीरी

मसअला
क़अदा में मुक़तदी सो गया इमाम सलाम फेर कर और दो रकअत पढ़कर क़अदा में आया अब ये बेदार हुआ तो अगर मालूम हो गया तो सलाम फेर कर शामिल हो जाए और इमाम के सलाम फेरने के बाद जल्दी पूरी करके इमाम के साथ हो जाए।
📚आलमगीरी

मसअला
वित्र पढ़ने के बाद लोगों को याद आया के दो रकतें रह गईं तो जमाअत से पढ़ लें और आज याद आया के कल दो रकअतें रह गई थीं तो जमाअत से पढ़ना मकरूह है।
📚आलमगीरी

मसअला
सलाम फेरने के बाद कोई कहता है दो हुईं कोई कहता है तीन तो इमाम के इल्म में जो हो उसका एतबार है और इमाम को किसी बात का यक़ीन ना हो तो जिसको सच्चा जानता हो उसका क़ौल एतबार करे अगर इसमें लोगों को शक हो के बीस हुईं या अट्ठारह तो दो रकअत तन्हा-तन्हा पढ़ें।
📚आलमगीरी

मसअला
अगर किसी वजह से नमाज़े तरावीह फ़ासिद हो जाए तो जितना क़ुरआन मजीद उन रककतों में पढ़ा है इआदा करें ताके ख़त्म में नुक़सान ना रहे।
📚आलमगीरी

मसअला
अगर किसी वजह से ख़त्म ना हो तो सूरतों की तरावीह पढ़ें और इसके लिए बअज़ों ने ये तरीका रखा है के अलम तरा कैफ, से आखिर तक 2 बार पढ़ने में 20 रकअतें हो जाएंगी।
📚आलमगीरी

मसअला
एक बार बिस्मिल्लाह शरीफ़ जिहर (आवाज़) से पढ़ना सुन्नत है और हर सूरत की इबतिदा में आहिस्ता पढ़ना मुस्तहब और ये जो आजकल बअज़ जाहिलों ने निकाला है के 114 बार बिस्मिल्लाह जिहर (आवाज़) से पढ़ी जाए वरना खत्म ना होगा मजहबे हन्फी में बेअसल है।

मसअला
मुताख़्ख़िरीन ने खत्में तरावीह में तीन बार क़ुलहु वल्लाह पढ़ना मुस्तहब कहा और बेहतर ये के ख़त्म के दिन पिछली रकअत में अलिफ लाम मीम से मुफ़्लिहून तक पढ़े।

मसअला
शबीना के एक रात की तरावीह में पूरा क़ुरआन पढ़ा जाता है जिस तरह आजकल रिवाज है के कोई बैठा बातें कर रहा है कुछ लोग लेटे हैं कुछ लोग चाय पीने में मशगूल हैं कुछ लोग मस्जिद के बाहर हुक़्क़ा नोशी कर रहे हैं (बीड़ी सिगरेटपी रहे हैं) और जब जी में आया एक आध रकअत में शामिल भी हो गए ये नाजाइज़ है।

फ़ायदा
हमारे इमामे आज़म रज़िअल्लाहू तआला अन्ह रमज़ान शरीफ़ में 61 ख़त्म किया करते थे 30 दिन में और 30 रात में और एक तरावीह में और 45 बरस इशा के वुज़ू से नमाज़े फ़जर पढ़ी है।
📚 बहारे शरिअत हिस्सा 4. सफ़ह 36—37) पुराना एडीसन, मतबूआ क़ादरी किताब घर, बरेली शरीफ़

तरावीह का बयान मुकम्मल हुआ

लेखक
मुफ़्ती मुहम्मद ज़ुल्फ़ुक़ार ख़ान न‌ईमी
अब्दुल्लाह रज़वी क़ादरी

मुरादाबाद यू०पी०

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