गोरखपुर

इस्लाम में नस्ल, रंग, ज़बान का भेदभाव नहीं, इस्लाम की बुनियाद अल्लाह की रज़ा

जंगे आज़ादी में उलमा-ए-अहले सुन्नत ने अहम किरदार निभाया: मौलाना जहांगीर

घासीकटरा में जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी

गोरखपुर। इस्लाम चक कर्बला के पीछे घासीकटरा में मंगलवार को जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी हुआ। क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत से आगाज़ किया गया। हम्द, नात व मनकबत पेश की गई। संचालन हाफ़िज़ रहमत अली निज़ामी ने किया।

मुख्य अतिथि संतकबीरनगर के शहर क़ाज़ी मुफ़्ती मोहम्मद अख़्तर हुसैन अलीमी क़ादरी ने कहा कि हज्जतुल विदा के मौक़े पर पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आख़िरी ख़ुत्बा भाईचारगी की वाज़ेह तालीम देता है। ऐ लोगों तुम्हारा रब एक है, तुम्हारा बाप एक है, तुम सब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद हो और हज़रत आदम मिट्टी से पैदा किए गए हैं। तुम में से अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो तुम में सब से ज्यादा मुत्तक़ी हो, यानी अल्लाह से डरने वाला हो। किसी अजमी को अरबी पर या सफ़ेद को सुर्ख व सियाह रंगत वाले पर कोई बड़ाई हासिल नहीं। मालूम हुआ कि दीन-ए-इस्लाम में न नस्ल का इख़्तिलाफ़ (भेदभाव) है न रंग और ज़बान का बल्कि दीन-ए-इस्लाम की बुनियाद अल्लाह की रज़ा पर रखी गई है, इस राह में जो शख़्स जिस क़द्र तेज़ रफ़्तार होगा उसी क़द्र दुनिया व आखिरत में सरफ़राज़ होगा, इस मंज़िल के लिए किसी नस्ली सर्टिफ़िकेट की ज़रूरत नहीं है, बल्कि तक़वा, परहेज़गारी, भाईचारगी और मोहब्बत ही इस रास्ते के मुसाफ़िरों का सामाने सफ़र है।

अध्यक्षता करते हुए मौलाना जहांगीर अहमद अज़ीज़ी ने कहा कि हिन्दुस्तान में अंग्रेज आए और अपनी मक्कारी से यहां के हुक्मरां बन गए। सबसे पहले अंग्रेजों के ख़िलाफ़ अल्लामा फज्ले हक़ खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से जिहाद के लिए फतवा दिया। पूरे मुल्क के हिंदू-मुसलमान तन, मन, धन से अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सरफ़रोशी का जज़्बा लिए मैदान में कूद पड़े। लाल किले पर सात हजार सुन्नी उलमा-ए-किराम को अंग्रेजो ने सरे आम फांसी दी। उलमा-ए-अहले सुन्नत ने अपने खून से हिन्दुस्तान को सींचा और लोगों को गुलामी के जंजीरों से आज़ाद होने का जज़्बा पैदा किया। हज़रत सुल्तान टीपू हिन्दुस्तान के पहले मुजाहिद हैं जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद किया और सबसे पहले तसव्वुरे आज़ादी का जेहन दिया। मौलाना हिदायत रसूल जो आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमां के शागिर्दे ख़ास थे। इन्हें भी अंग्रेजों ने फांसी की सजा दी थी। आप बहुत बड़े तकरीर दां थे अंग्रेजों के ख़िलाफ़ पूरी ज़िंदगी बोलते रहे। तकरीर करने में इन्हें महारत हासिल थी। आला हज़रत इनके बारे में फरमाते थे कि अगर मुझ जैसा एक क़लम का धनी और हिदायत रसूल जैसा एक और तकरीर करने वाला मिल जाता तो हम दोनों मिलकर ही अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से बाहर निकाल देते।

विशिष्ट अतिथि मौलाना जमील अख़्तर मिस्बाही ने कहा कि हज़रत सैयद किफायत अली काफी मुरादाबादी, हज़रत शाह वलीउल्लाह, हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़, नवाब सिराजुद्दौला, मुफ्ती किफायत उल्ला कैफी, मुफ्ती इनायत अहमद, हाफ़िज़ रहमत खां, मौलाना रज़ा अली खां, बेगम हज़रत महल, मौलाना अब्दुल हक़ खैराबादी, मौलाना नकी अली ख़ां जैसे लाखों मुसलमानों ने मुल्क के लिए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी, यह सभी वतन से बेपनाह मोहब्बत रखते थे। जंगे आज़ादी में उलमा-ए-अहले सुन्नत ने अहम किरदार निभाया।

अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमनो-अमान, तरक्की व भाईचारगी की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई। जलसे में हाफ़िज़ आमिर हुसैन निज़ामी, मौलाना मकसूद आलम, मो. दानिश रज़वी, हाफ़िज़ नेहाल अहमद, मो. दारैन, आज़म रज़ा, हाफ़िज़ अलकमा आदि ने शिरकत की।

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