चुनावी हलचल राजनीतिक

अपनी ही माया जाल में फंसी मायावती

निश्चित रूप से बसपा का मुसलमानों में अच्छा जनाधार रहा है मगर आज? मायावती के बयानों से लगता है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसा बनना चाहती हैं, भाजपा का साथ और मुसलमानों का विश्वास दोनों एक साथ बरकरार रखना चहती हैं। निश्चित ही यह खेल जोखिम भड़ा है, उनके इस निर्णय से सेकुलर विरोधी खेमा ही नहीं बल्कि बसपा में भी जबरदस्त रोष व्याप्त है

मो0 रफी
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कहते हैं कि ज्यादा होशियारी जी का जंजाल बन जाती है। यही हुआ है पाॅलिटिकल चेंजर मायावती कि। सत्ता का लोभ सब को है, मगर इस तरह कि कोई अपनी जमीर बेच दे ये बिल्कुल ही अशोभनीय है। क्षेत्रीय दलों का गठन ही महत्त्वकांक्षा पर आधारित होती है। परंतु भारती राजनीति में दो व्यक्ति अतिमहत्वाकांक्षी साबित हुए हैं, इन में एक नाम भुतपूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का है तो दूसरा मायावती का। दोनों का राजनीतिक आधार एक ही रहा है। रामविलास पासवान तो मौसम वैज्ञानिक कहलाते थे, क्योंकि परिस्थितियों का वो बेहतर आकलन करते, इसीलिए वे अपने जीवन के अंतिम समय तक सत्ता का हिस्सा रहे। परंतु मायावती का हठ, अदूरदर्शिता और परिस्थितियों के विपरित चलने का परीणाम उसे भुगतना पड़ा और वे किसी भी खेमे का विश्वास प्राप्त नहीं कर सकी। अब जहां देश भर में जातीय जनगणना कराने की मांग आंदोलन का रुप लेती जा रही है ऐसे में मायावती का स्टैंड उत्तर प्रदेश विधानसभा 2022 की आगामी रणनीति का आभास कराती है। जिस तरह उसने कहा कि यदि मोदी सरकार जाति आधारित जनगणना के लिए सकारात्मक कदम उठाती है तो बसपा उसका संसद के भीतर और बाहर समर्थन कर सकती है। इससे पहले भी मायावती भाजपा के हार्ड लाईन, हिन्दुत्व कार्ड खेलने और मंदिर निर्माण अभियान में अपनी भुमीका निभाने का एलान कर चुकी हैं।
दरअसल राजनीति में जमीन खो चुकी मायावती संभावना तलाश रही हैं। विश्लेषक उसे भाजपा विरोधी खेमा की स्वभाविक सहयोगी मान रहे थे मगर अब मायावती की गतिविधियों ने उनके पोल खोल दिए हैं। शायद आपको याद हो कि वर्ष 1999 में एक वोट से वाजपयी जी की सरकार गिराने वाली मायावती ने 1995 में भाजपा के समर्थन से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी। इससे जाहिर होता है कि भाजपा से उनका नजदीक का संबंध रहा है, मगर भाजपा से संबंध की बातों पर मायावती बिफर पड़ती हैं। एक बार उन्होंने अपनी सफाई देते हुए कहा था कि ” उनकी पार्टी भाजपा की विचारधारा के विपरीत है और भविष्‍य में विधानसभा या लोकसभा चुनाव में भगवा पार्टी के साथ कभी गठबंधन नहीं करेगी. उपचुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस हमारी पार्टी के खिलाफ साजिश में लगी है। वह गलत ढंग से प्रचार कर रही है ताकि मुस्लिम समाज के लोग बसपा से अलग हो जाएं। उन्‍होंने कहा कि बसपा सांप्रदायिक पार्टी के साथ समझौता नहीं कर सकती है। हमारी विचारधारा सर्वजन धर्म की है और भाजपा की विपरीत विचारधारा है। “
मायावती ने यह भी कहा कि ” बसपा सांप्रदायिक, जातिवादी और पूंजीवादी विचारधारा रखने वालों के साथ कभी गठबंधन नहीं कर सकती है। उन्‍होंने कहा कि वह राजनीति से संन्यास ले सकती हैं, लेकिन ऐसी पार्टियों के साथ नहीं जाएंगी। उन्होंने दावा किया कि वह सांप्रदायिक, जातिवादी और पूंजीवादी विचारधारा रखने वालों के साथ सभी मोर्चों पर वह लड़ेंगी और किसी के सामने झुकेंगी नहीं।”

उन्होंने यह भी कहा कि ” सभी यह जानते हैं कि बसपा एक विचारधारा और आंदोलन की पार्टी है और जब मैंने भाजपा के साथ सरकार बनाई तब भी मैने कभी समझौता नहीं किया। मेरे शासन में कोई हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। इतिहास इसका गवाह है। मायावती ने कहा कि बसपा ने विपरीत परिस्थितियों में जब कभी भाजपा से मिलकर सरकार बनाई तो भी कभी अपने स्‍वार्थ में विचारधारा के खिलाफ गलत कार्य नहीं किया। “
मायावती ने यूपी में अकेले चुनाव लड़ने का एलान किया है, उन्‍होंने सपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि ” समाजवादी पार्टी जब भी सत्ता में आई तो भाजपा मजबूत हुई है। राज्य में भाजपा की मौजूदा सरकार सपा के कारण बनी है। उन्‍होंने याद दिलाया कि उप चुनाव में बसपा ने सात सीटों में दो पर मुस्लिम उम्‍मीदवार उतार कर उनको प्रतिनिधित्‍व दिया है। ” मायावती ने मुस्लिम प्रेम जाहिर करते हुए कहा कि यूपी में अपने अकेले दम पर या भाजपा के साथ मिलकर जब भी हमने सरकार बनाई तो मुस्लिम समाज का कोई नुकसान नहीं होने दिया, भले ही अपनी सरकार क़ुर्बान कर दी। उन्‍होंने संक्षेप में कहा कि 1995 में जब भाजपा के समर्थन से मेरी सरकार बनी तो मथुरा में भाजपा और आरएसएस के लोग नई परंपरा शुरू करना चाहते थे लेकिन मैंने उसे शुरू नहीं होने दिया और मेरी सरकार चली गई। उन्होंने कहा कि 2003 में मेरी सरकार में जब भाजपा ने लोकसभा चुनाव में गठबंधन के लिए दबाव बनाया तब भी मैंने स्‍वीकार नहीं किया. मायावती ने कहा कि भाजपा ने सीबीआई और ईडी का भी दुरुपयोग किया, लेकिन मैंने कुर्सी की चिंता नहीं की. उन्‍होंने कहा कि सीबीआई और ईडी जब 2003 में मुझे परेशान कर रही थी तो उस समय कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का फोन आया था और न्‍याय दिलाने का वादा किया लेकिन लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही लेकिन कोई मदद नहीं की और मुझे अंतत: सुप्रीम कोर्ट से न्‍याय मिली।
मायावती ने तब अपनी सफाई पेश की थी, अब उसका स्टैंड क्या है? बड़ा सवाल है। निश्चित रूप से बसपा का मुसलमानों में अच्छा जनाधार रहा है मगर आज? मायावती के बयानों से लगता है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसा बनना चाहती हैं, भाजपा का साथ और मुसलमानों का विश्वास दोनों एक साथ बरकरार रखना चहती हैं। निश्चित ही यह खेल जोखिम भड़ा है, उनके इस निर्णय से सेकुलर विरोधी खेमा ही नहीं बल्कि बसपा में भी जबरदस्त रोष व्याप्त है। पुनः एक बार फिर से मायावती पर भाजपा से नजदीकियों का आरोप लगने लगा है जबकि तमाम राजनीतिक विश्लेषक बसपा को योगी सरकार के अंत का एक बड़ा हथियार मान रहे हैैं। जानकार बताते हैं कि मायावती भाजपा के साथ लड़े अथवा अकेले, लाभ भाजपा को ही होगा। इसलिए अगर वह अपने अकलियत व दलित जनाधार को बरकरार रखना चाहती है तो उसे वास्तव में गेम चेंजर की भूमिका में आना होगा नहीं तो अंत में वही होगा, न माया मिली न मोह। मुस्लिम मतदाता समय आने पर ओवैसी को छोड़ सकती है तो मायावती क्या चीज है।

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