गलत फहमियो का निवारणधार्मिक

“मैं जीव हूँ मांस नहीं” के पोस्टर मुस्लिमो के खिलाफ नफ़रत और ज़हर फैलाने का एजेंडा

सवाल:- ईद उल अज़हा के मौके पर कई जगह पोस्टर लगाए जाते हैं और खबरें चलाई जाती हैं जिनमे जानवरो की तस्वीर होती है और लिखा होता है “में जीव हूँ मांस नहीं” या दूसरे प्रकार से ईद के बारे में आपत्ति ली जाती है इस बारे में जवाब दें?

जवाब:-  मैं भी जीव हूँ, माँस नही। इस तरह के पोस्टर सिर्फ़ ईद-उल-अज़हा के मौके पर ही क्यों लगाए जाते हैं? या इस तरह की बातें ईद के बारे में ही क्यों चलाई जाती हैं ?

भारत की कुल 71% जनता मांसाहारी है। जबकि मुस्लिमो की संख्या मुश्किल से 16% मात्र है।
यानी मुस्लिमो से 3.5 गुना ज़्यादा माँस का उपभोग तो सिर्फ़ भारत में ही दूसरे धर्मों के लोग कर रहे हैं।

अतः साल भर इन पोस्टर वाले महानुभावों का पशु प्रेम सिर्फ़ ईद-उल-अज़हा के मौके पर ही क्यों जागता है?

क्या इसके पीछे वाकई पशु प्रेम है या इस्लाम और मुस्लिमो के खिलाफ नफ़रत और ज़हर फैलाने का एजेंडा है?

क्या आपने विभिन्न धर्मो के त्योहारों, उत्सवों के मौके पर कभी यह पोस्टर देखा है?
जबकि कई समुदायों में बलि की प्रथा है और कई त्योहारों पर बलि दी जाती है!

या कभी अपने McDonald, KFC , जैसी जगहों पर जहाँ साल भर मज़े से चिकन उड़ाया जाता है के सामने मुर्गा लगा कोई पोस्टर देखा की मैं भी जीव हूँ, भोजन नहीं?

तो क्या ये समझा जाये कि मुर्गा जीव नहीं है? या सिर्फ़ मुस्लिमो के माँसाहार से दिक्कत है बाकियो से नहीं?

भारत में प्रमुखता से लगभग 10 धर्मो के लोग रहते हैं इसमें सिर्फ़ जैन मत को छोड़ कर किसी भी धर्म में माँस खाना निषेध नहीं है।
वेदों में बलि के कई उल्लेख मिलते हैं, कई राज्यों में बलि जतरा, दशहरा आदि मौकों पर पशु बलि प्रथा है। पशु बलि छोड़ भी दें तो यूँ ही उपभोग और एक्सपोर्ट के लिए हमारे देश में भारी मात्रा में माँस का उत्पादन होता है।

यही कारण है भारत मांस निर्यात के मामले में 2015 में विश्व में नंबर 1, 2016 में नम्बर 3 और 2017 में नम्बर 2 पर और 2018 में 3 नम्बर और 2020 में विश्व में 30 देशो में से 4 नम्बर पर रहा है। और इन कंपनियों के प्रमुख मुस्लिम नहीं बल्कि दूसरे धर्मो के लोग है।

अतः यह स्पष्ट है कि इस तरह के पोस्टरों के औऱ खबरों के पीछे असली एजेंडा देश में नफ़रत, घृणा और समाज में ज़हर फ़ैलाना है। माँस का उपभोग तो साल भर जारी रहता है। यह तथ्य तो सिर्फ़ भारत के दिये गए है जबकि विश्व की बात की जाए तो  90 प्रतिशत जनता मांसाहारी है।

अपितु ईद-उल-अज़हा के मामले में यह विशेषता है कि यह सीधे तौर पर गरीब केंद्रित है। जहाँ गरीबो को माँस वितरण से सीधा लाभ पहुँचता है वही पशु पालन से हर धर्म के कई गरीब किसानों की आय का एकमात्र साधन कुर्बानी के जानवर को तैयार करना और बेचना होता है।
इसीलिए यह पोस्टर देखकर, पोस्टर लगाने वाले के झांसे में आने से पहले एक बार पोस्टर लगाने वाले कि असली मंशा पर ज़रूर ध्यान दें।

शोऐब रज़ा

विश्व प्रसिद्ध वेब पोर्टल हमारी आवाज़ के संस्थापक और निदेशक श्री मौलाना मोहम्मद शोऐब रज़ा साहब हैं, जो गोरखपुर (यूपी) के सबसे पुराने शहर गोला बाजार से ताल्लुक रखते हैं। वे एक सफल वेब डिजाइनर भी हैं। हमारी आवाज़

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