सामाजिक

एक औरत की दर्द भरे दास्तां

लेखक: मह़मूद रज़ा क़ादरी, गोरखपुर

एक जगह एक प्रोग्राम में मेरा जाना हुआ तो देखा कि एक खातून बड़ी मायूस थी मुसलसल आंखें आंसुओं से तर थी जब प्रोग्राम से फारिग हुए तो मुसाफा के वक्त फूट-फूटकर रोने लगी मैंने तसल्ली देते हुए उन्हें बोलने की हिम्मत दिलाई और पूछा कि मसला क्या है?? रोने की वजह तो बताएं अल्लाह अल्लाह वाकई उनका सदमा बड़ा दर्द वाला था उन्होंने बताना शुरू किया।
मेरे भाई मेरी एक जवान बेटी थी हर चीज ठीक था घरेलू कामकाज में भी बहुत तेज थी मगर क्या कहें की कुदरत ए इलाही से वह जरा खूबसूरत कम थी रंग गोरा नहीं था कद से छोटी थी जिस की वजह से उसके रिश्ते और शादी में बड़ा मसला हो रहा था हम लोग तकरीबन 5 -6 साल से उसका रिश्ता तलाश रहे थे। इन 5–6 साल में बता नहीं सकती कि कितनी जगह उस बच्ची की तस्वीर गई।
और उसके कितने एैब (खामी)निकाले गए इधर आकर हम भी मायूस हो गए और हमारी परेशानी बढ़ती गई इस चीज़ को मेरी बच्ची ने महसूस कर लिया वह भी चार-पांच साल से अपने एैबों (खामीयों)को सुन सुनकर परेशान हो चुकी थी जब हमारी मजबूरी और परेशानी देखी तो उससे रहा न गया और अभी पन्द्रह (15)दिन पहले रात की तन्हाई में हम सब से छुपकर अपने ही दुपट्टे से अपने गले को घोंट ली जब सुबह हम उठे तो अपनी मरी हुई बच्ची को पंखे से लटके हुए देखा अब आप बताएं कि हम सब्र करेंगे।??
अल्लाह हू अकबर वाकई यह बड़ा दर्द देने वाला बयान था और यह एक घर का सदमा बयान हुआ लेकिन हजारों ऐसे घर हैं जिन्हें इस किस्म के गम सहने पड़े हमारे मुआशरे में बच्चियों के रिश्ते का एक बड़ा मसला है इसलिए हमें यानी, वालीदैन बच्चियों और अहले मुआशरा का कुछ बातें याद रखनी चाहिए।

मां बाप से कुछ गुजारिश करता हूं

1 मां बाप को अपनी औलाद के रिश्ते की फ़िक्र उनके बालिग होते ही शुरू कर दें यानी रिश्ता तलाशें ताकि वक्त पर शादी हो जाए
2 मगर याद रहे कि कोशिश ये होनी चाहिए कि बच्चियों को उसकी खबर ना, मिले खासकर जिन बच्चियों में एैब निकाले जा रहे हो और अगर उनकी कमीयां निकाले जाते हो तो मां बाप सुनकर अपने तक ही रखें बच्चियों को इस तकलीफ से बचायें
3 मां बाप कम्पर माईज़ करने का इरादा बनाकर ही रिश्ता तलाशें अपनी कमीयों को नज़र में रखें।
बच्चियों के सामने एेसा कभी ज़ाहिर ना करें कि तुम्हारी (कुदरती) कमी की वजह से हम अब बहुत परेशान हो गए हैं।
4 ताखीर होने से मां बाप को हार नहीं मानना चाहिए बल्कि अपनी कोशिश दुआ के जरिए मुसलसल जारी रखें।

बच्चियों के लिए चंद नसीहत

1 बच्चियों को सब्र और तहम्मुल से काम लेना चाहिए अल्लाह पर भरोसा रखें और याद रखें कि तक़दीर पर ईमान रखना शरीयत ने लाज़िम करार दिया है। जब रिश्ते में ताखिर हो तो ये सोचकर सब्र करें कि अल्लाह तआला ने हमारी तकदीर जब और जहां लिखा होगा जरूर होगा।
2 और ये भी याद रखें कि अल्लाह ने जिस हालत में रखा है। वही हमारे लिए बेहतर है देखें उन बच्चियों को जिनका रिश्ता तो जल्द हो गया लेकिन आज वह अपने ही घर में तलाक लेके बैठीं हैं ।
तो क्या आप उनसे बेहतर नहीं? क्या आप का गम उनसे हल्का नहीं? हम नहीं जानते की ताखीर में कितनी हिकमतें हैं लिहाजा घबराए नहीं सब्र रखें और साथ ही मां बाप अपनी तलाश जारी रखें।

मुआशरे की जिम्मेदारी

1 एेसे जो हादसात होते हैं। इनमें मुआशरे का भी बड़ा किरदार होता है। हमें चाहिए कि कभी किसी की कुदरती कमी की वजह से उन्हें लान तान ना बनाएं।
2 अपने बच्चों के रिश्ते ढूंढते वक्त लड़की के घर यूंही ना चले जाएं बल्कि उसके बारे में पहले से ही अच्छी तरह मालूमात कर लें जम उम्मीद हो की ठीक है और यही रिश्ता करना है तब लड़की को देखें।
3 अगर कोई कमी नज़र आए रिश्ता मंजूर ना हो तो इस अंदाज में बयान करें कि बच्ची और उसके मां-बाप अपने आप को कमजोर और कमतर ना समझने लगे।
4 इसी तरह अगर किसी की शादी में लेट हो तो लिल्लाह उसकी तहकीर और तजलील(ज़लील)ना करें। और कभी भी उनको मनहूस वगैरह कह कर या समझ कर उसकी दिल शिकनी (तोड़ा)ना करें।

एै काश! सबके दिल में मेरी बात उतर जाए

शादी करें लेकिन कीमत वसूल नहीं करनी चाहिए दहेज देना गलत नहीं मां बाप बेटी को अपनी खुशी से अपनी हैसियत के मुताबिक जो कुछ दें वह हरगिज लानत नहीं हो सकता
असली खराबी तो इस रिवाज बना लेने में है कि उसके बगैर शादी हो ही नहीं सकती और अगर हो भी जाए तो जाहिलों के यहां उस बहू कि इज्जत ही नहीं होती जो खाली हाथ ससुराल आ जाए उसे घर की बेटी बनाने और प्यार मोहब्बत देने की बजाय दिन-रात ताने और मारपीट दिए जाते हैं।

मुझे अफसोस होता है एैसे लालची लोगों की सोच पर

जो गरीब मां-बाप अपना पेट काटकर औलाद की परवरिश करते हैं सारी जिंदगी टूटे-फूटे मकान में गुजार देते हैं दो वक्त की रोटी के लिए खून पसीना एक करते हैं वह अपनी बेटियों का घर बसाने के लिए लाखों का दहेज कहां से लाएं? वह अपने वजूद का टुकड़ा आप के हवाले कर रहे हैं क्या इतना काफी नहीं है ? क्या लड़कियों की इज्जत तभी होगी जब वह ट्रक भरकर दहेज लाएंगी?क्या आपके बेटे का घर तभी बसेगा जब उसकी दुल्हन दुनिया की चीजें अपने साथ लाएगी? क्या आपके नज़दीक किसी की बेटी से ज्यादा कोई और(दहेज़) चीज मायने रखती है।

खुदारा अपनी सोच को बदलें।
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रिश्ता होते ही लड़कियों के मां-बाप से मुतालबा करना शुरू कर देना और फिर शादी की बात होती ही दहेज की लंबी लिस्ट लड़की के मां-बाप के हवाले कर देना कहां की इंसानियत है।??
क्या गुजरती होगी उस लड़की के दिल पर जिसके मां बाप का बाल बाल उसके दहेज की वजह से कर्ज़ में जकड़ जाता है और फिर दहेज का ट्रक ससुराल पहुंच जाने के बाद वह मां-बाप के घर की दहलीज पार करें उसे तो यही लगेगा कि जिसके लिए मैं अपना घर छोड़ कर जा रही हूं उसके और उसके घरवालों के नजदीक मुझसे ज्यादा सामान की अहमीयत है।
या फिर मुआशरे का रसम और रिवाज ने मुझे मेरे ही मां बाप पर बोझ बना दिया कि वह मेरा घर बसाने की इतनी भारी कीमत अदा कर रहे हैं।
आजकल दहेज की लिस्ट लड़के की हैसियत के मुताबिक होती है कि भाई हमारा बेटा तो डॉक्टर है, तो हमारा बेटा इंजीनियर है, हमने दिन-रात एक करके इसे पढ़ाया लिखाया है। इस ओहदे पर पहुंचाया है। तो अब हम डिमांड भी ना करें भला??

माफी के साथ ये कहता हूं कि

आपने अपने बेटे को डॉक्टर बनाया या इंजीनियर वह आपकी अपनी ख्वाहिश थी और जो पैसा अपने बेटे पर लगाया ब हैसीयत मां-बाप ये आपका फर्ज बनता था जो आपने बहुत अच्छे तरीके से पूरा किया लेकिन बेटे की हैसियत मुताबिक दहेज की लिस्ट बना कर देना की शादी करना नहीं बल्कि दहेज की सूरत में लड़की वालों से अपने बेटे की कीमत उसूल करना है।

शादी करें लेकिन कीमत उसूल नहीं”

अल्लाह तआला हमें समझने की तौफीक अता फरमाए

शोऐब रज़ा

विश्व प्रसिद्ध वेब पोर्टल हमारी आवाज़ के संस्थापक और निदेशक श्री मौलाना मोहम्मद शोऐब रज़ा साहब हैं, जो गोरखपुर (यूपी) के सबसे पुराने शहर गोला बाजार से ताल्लुक रखते हैं। वे एक सफल वेब डिजाइनर भी हैं। हमारी आवाज़

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