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गोरखपुर: कर्बला दुनिया-ए-इस्लाम की सबसे दर्दनाक दास्तान: नायब काज़ी

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  • अकीदतमंदों में बंटी हुसैनी लस्सी व शीरीनी
  • मस्जिदों में बयां की गई हज़रत इमाम हुसैन की फज़ीलत

गोरखपुर। माहे महुर्रम की पहली तारीख़ से शहर की विभिन्न मस्जिदों में जारी महफिल ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ के तहत सोमवार को कर्बला के वाकयात पर‌ रौशनी डाली गई। इमाम हुसैन की याद में फातिहा ख्वानी व दुआ ख्वानी का दौर शुरु है। मुस्लिम बाहुल्य मोहल्लों व मियां साहब इमामबाड़ा में रौनक रह रही है। गौसे आज़म फाउंडेशन के जिलाध्यक्ष समीर अली, हाफिज मो. अमन, मो. फैज, वारिस अली, मो. इमरान, मो. जैद, अमान अहमद, रियाज़ अहमद, मो. शारिक, सैफ अली, मो. जैद चिंटू, समीर अहमद, सैयद जैद आदि ने बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में अकीदतमंदों के बीच हुसैनी लस्सी बांटी।

मरकजी मदीना जामा मस्जिद रेती में मुफ्ती मेराज अहमद क़ादरी ने कहा कि हज़रत सैयदना इमाम हुसैन ने दीन-ए-इस्लाम के सिद्घांत, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और अल्लाह के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते रहे।

बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर में कारी शराफत हुसैन क़ादरी ने कहा कि हज़रत सैयदना इमाम हुसैन मक्का से सपरिवार कूफा के लिए निकल पड़े लेकिन रास्ते में यजीद के षड़यंत्र के कारण उन्हें कर्बला के मैदान में रोक लिया गया। तब इमाम हुसैन ने यह इच्छा प्रकट की कि मुझे सरहदी इलाके में चले जाने दो, ताकि शांति और अमन कायम रहे, लेकिन जालिम यजीद न माना। आखिर में सत्य के लिए लड़ते हुए हज़रत इमाम हुसैन शहीद हुए।

सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में मौलाना अली अहमद ने कहा कि इल्म व फज्ल व तमाम अहले तारीख़ का एक राय फैसला है कि हज़रत सैयदना इमाम हुसैन इल्म व फज्ल में बड़ा मर्तबा रखते थे। आपके दौर के बड़े-बड़े आलिम आपसे फतवा दर्याफ्त करते थे।

जामा मस्जिद रसूलपुर में मौलाना जहांगीर अहमद अजीजी ने कहा कि इमाम हुसैन की तकरीर व तहरीर (लेखनी) की कोई नजीर (उदाहरण) नहीं मिलती। आज भी आपकी तकरीरें व खुत्बात तारीख के सफ़हात (पन्नों) की जीनत (खूबसूरती) बने हुए है। जिन्हें पढ़कर आपके जोरे बयान और फसाहत व बलागत का अंदाजा होता है। हज़रत इमाम हुसैन ने भी अपने बड़े भाई हज़रत सैयदना इमाम हसन के साथ पच्चीस हज अदा किए।

मस्जिद फैजाने इश्के रसूल अब्दुल्लाह नगर में मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी ने कहा कि जालिम यजीद के अत्याचार बढ़ने लगे तो उसने पैग़ंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हज़रत सैयदना इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इंकार कर दिया तो उसने इमाम हुसैन को कत्ल करने का फरमान जारी कर दिया।

पुराना गोरखपुर गोरखनाथ में नायब काजी मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने कहा कि कर्बला के तपते रेगिस्तान में तीन दिन के भूखे प्यासे हज़रत इमाम हुसैन व उनके जांनिसारों को शहीद कर दिया गया। अहले बैत पर बेइंतहा जुल्म किए गए। यह दुनिया-ए-इस्लाम की सबसे दर्दनाक दास्तान है। जिसे सुनकर बड़े-बड़े बहादुरों के दिल हैबत से कांप जाते हैं। आपने अपनी व अपने जांनिसारों की कुर्बानी देकर दीन-ए-इस्लाम को बचा लिया। इमाम हुसैन, उनकी औलाद व जांनिसारों की कुर्बानी को रहती दुनिया तक मुसलमान भुला नहीं सकते।

इसी तरह एक दर्जन से अधिक मस्जिदों में भी ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ महफिल हुई। अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमनो अमान की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई।

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