कहानी सामाजिक

क़र्ज़ वाली लड़की

एक 15 साल के भाई ने अपने वालिद से कहा “अब्बूजान, बाजी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है, अभी जीजा जी ने फोन पर बताया।”

उसकी बड़ी बहन का रिश्ता कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुआ था।

अहमद सहाब पहले से ही उदास बैठे थे, धीरे से बोले…

“हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था के वो एक दो दिन में दहेज की बात करने आ रहे हैं.. बोले… दहेज के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है”..

बड़ी मुश्किल से ये अच्छा लड़का मिला है.. कल को उनकी दहेज की मांग इतनी ज़्यादा हो के मैं पूरी नहीं कर पाया तो ?”

कहते कहते उनकी आँखें भर आई..

घर के हर एक शख़्स के मन व चेहरे पर फिक्र की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी…लड़की भी उदास हो गयी…

ख़ैर..

अगले दिन समधी-समधन आए.. उनका बख़ूबी इस्तक़बाल किया गया..

कुछ देर बैठने के बाद लड़के के वालिद ने लड़की के वालिद से कहा “अहमद सहाब, अब काम की बात हो जाए”..

अहमद सहाब की धड़कन बढ़ गई.. बोले.. “हां हां.. समधी जी, ज़रूर”..

लड़के के वालिद ने धीरे से अपनी कुर्सी अहमद सहाब की ओर खिसकाई और धीरे से उनके कान में बोले, “अहमद सहाब, मुझे दहेज के बारे बात करनी है!”…

अहमद सहाब….”जो आप को अच्छा लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा”..

समधी जी ने धीरे से अहमद सहाब का हाथ अपने हाथों से दबाते हुए बस इतना ही कहा…..

“आप लड़की की बिदाई में कुछ भी देगें या ना भी देंगे… थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे.. मुझे सब क़बूल है… पर क़र्ज़ लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत देना. निकाह के दिन आम खाने की दावत मत करना, क्यों के लड़की के निकाह का खाना ना-जायज़ है, वो मुझे क़बूल नहीं”..

क्योंकि जो, बेटी अपने बाप को क़र्ज़ में डुबो दे वैसी “कर्ज वाली लड़की” मुझे क़बूल नही”…

“मुझे बिना क़र्ज़ वाली बहू ही चाहिए.. जो मेरे यहाँ आकर मेरे घर को बरकतों से भर देगी”..

अहमद सहाब हैरान हो गए.. उनसे गले मिलकर बोले.. “समधीजी, बिल्कुल ऐसा ही होगा…!”

सबक :- क़र्ज़ वाली लड़की ना कोई बिदा करें, न ही कोई क़बूल करे.

۞आज के दौर में बहोत सारे मां-बाप परेशान है, लोग दहेज मांग रहे है, बहोत सारी लड़कियां बिना शादी के घरों में बैठी है, क्यों के उनके पास पैसा नहीं है।

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