कविता

सफ़र!

—सिद्दीक़ी मुहम्मद उवैस

अपनों से दूर कहीं सफ़र
कभी ग़ैरों के पास सफ़र
तो तन्हा किसी राह सफ़र
कहीं लोगों के झुंड के साथ सफ़र
फ़िर कहीं आराम की तलाश में सफ़र
तो कभी आराम छोड़कर सफ़र
कुछ पाने की चाह में सफ़र
बहुत कुछ खो जाने के बाद में सफ़र
कभी जिस्मों को थकाने वाले सफ़र
कभी हौसलों को बढ़ानेवाले सफ़र
कभी अंजाने से नए रास्तों के सफ़र
तो कभी जाने पहचाने से पुराने सफ़र
बेसूकूनी में लंबी मुसाफ़त के सफ़र
कहीं चैन व सूकूं के क़लील सफ़र
किसी मंज़िल से पहले सफ़र
तो कोई मंज़िल के बाद है सफ़र
हर सफ़र के बाद इक सफ़र
ज़िंदगी सफ़र के सिवा और कुछ भी नहीं….!!!!

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