गोरखपुर: बुद्धिजीवियों के मुताबिक यह वाकया 15 वीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध का है। उन दिनों जौनपुर में शर्की शासन था। साम्राज्य की कमान जब शर्की शासक इब्राहीम शाह के हाथ में थी तब उसे सूचना मिली कि गोरखपुर बदइंतजामी का शिकार हो गया है। यहां लूटपाट के मामले बढ़ गए हैं।
सूचना मिलते ही स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए उसने अपने एक सरदार हज़रत चीनी बख्श को कुछ घुड़सवार सैनिकों के साथ गोरखपुर भेजा। जब चीनी बख्श गोरखपुर आए तो उनके साथ ही उनके भाई हज़रत इलाही बख्श भी आए, जो सूफी संत थे। हज़रत चीनी बख्श आते ही व्यवस्था के नियंत्रण में लग गए, लेकिन हज़रत इलाही बख्श ने अपनी प्रकृति के मुताबिक सूफी विचारधारा फैलाना शुरू किया। दोनों भाइयों ने अपना कार्यक्षेत्र और आशियाना उसी इलाके को बनाया, जिसे आज की तारीख में इलाहीबाग कहा जाता है।
उन दिनों वह इलाका जंगल के रूप में था। हज़रत इलाही बख्श की संत प्रकृति व उनकी विचारधारा लोगों को भाने लगी और धीरे-धीरे उनकी शिष्य परंपरा का विस्तार होने लगा। लोग जब उनसे जुडऩे लगे तो उनके आशियाने के इर्द-गिर्द बसने का सिलसिला भी शुरू हो गया। समय के साथ यह बसावट इस रूप में बढ़ गई कि उसने एक मोहल्ले का रूप ले लिया। चूंकि अपने बसने के दौरान इलाही बख्श ने उस इलाके को एक बागीचे का रूप दे दिया था, सो वह इलाका इलाही के बाग के रूप में जाना जाने लगा।
इस वाकये की जानकारी देते हुए उस इलाके के पुराने वाशिंदे बताते हैं कि इलाहीबाग क्षेत्र में मौजूद चीनी बख्श और इलाही बख्श की मजार इस वाकये की गवाह है। इलाहीबाग आज शहर के पुराने मोहल्लों में शुमार है। घनी बस्ती और बेतरतीब बसावट इस बात की तस्दीक है कि यह मोहल्ला जरूरत के मुताबिक धीरे-धीरे बसा।