गोरखपुर दस्तावेज़

गोरखपुर: जानिए अस्करगंज व रेती को, मदीना मस्जिद व दुपट्टा गली यहीं है

गोरखपुर। मुहल्ला अस्करगंज कदीम (पुराना) मुहल्ला है। ‘अस्कर’ का अर्थ फौज से है। मुगल काल में यहां अस्तबल हुआ करते थे। फौज की एक टुकड़ी भी यहां रहा करती थी। रेती चौक क्षेत्र के कुछ फासले से राप्ती नदी का बहाव था। रेत के कारण ही रेती चौक नाम पड़ा। बादशाह औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम शाह ने धम्माल, अस्करगंज, शेखपुर, नखास बसाया और रेती पर पुल (उस वक्त राप्ती नदी पर) बनवाया। दबिस्ताने गोरखपुर किताब में लिखा हुआ है कि शाहजादा मुअज्जम शाह जब अपने वालिद शहंशाह औरंगजेब से नाराज होकर गोरखपुर चला आया और कुछ दिनों यहां ठहरा रहा तो शहर को वीरान देखकर इसकी आबादकारी का हुक्म दिया और इसका नाम अपने नाम की निस्बत से मुअज्जमाबाद रखा।

रेती की आन, बान व शान मदीना मस्जिद

रेती स्थित मदीना मस्जिद कोई मामूली मस्जिद नहीं है, ब्लकि यह करीब 70 से 75 साल पुरानी मस्जिद है। आज से 40-45 साल पहले इसके तीन शानदार गुंबद हुआ करते थे। दो लंबीं मीनारें थी। 13 सालों से मस्जिद के सेकेट्री परवेज अहमद खान हैं। जिन्होंने मस्जिद की पुरानी इमारत देखी और नमाज भी पढ़ी। उन्होंने बताया कि उस वक्त भी इसे मदीना मस्जिद कहते थे और आज भी मदीना मस्जिद के नाम से शोहरत है। मस्जिद का पूरा लुक शाही मस्जिद जैसा था। शानदार गुंबद व दो बड़ी मीनारें इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती थीं। मजबूत मोटी दीवारें थीं। मस्जिद के बीच का हिस्सा खुला था। पुरानी मदीना मस्जिद में एक साथ 500 से अधिक लोग नमाज अदा कर सकते थे। अलविदा वगैरह में तो मस्जिद के साथ पूरी सड़कें भर जाया करती थीं। दूर-दूर से लोग नमाज पढ़ने आते थे। उन्होंने एक 85 वर्षीय बुजुर्ग महिला के हवाले से बताया कि मस्जिद की जगह पर एक साहब का मकान था खपड़ैल का। उन्होंने मस्जिद के लिए दे दिया। मुहल्ले वालों ने मिलकर शाही मस्जिद के लुक में मदीना मस्जिद बनवायीं। करीब 45 साल पहले जब मस्जिद की दरो दीवार कमजोर हो गई तो मस्जिद की नई इमारत बनायी गयी। दो मंजिला इमारत बेहद शानदार है। हरे रंग का गुंबद, दो बड़ी व एक छोटी मीनार बेहद खूबसूरत है। मस्जिद को अंदर से बेहतरीन टाइल्स व मार्बल से सजाया गया है। मस्जिद के अंदर व बाहर मिलाकर चार वुजू खाना है। मस्जिद से सटीं कुछ दुकानें भी है। मस्जिद की बाहरी दीवारों पर लगे हरे रंग के टाइल्स व खिड़कियों पर लगे हरे रंगें के शीशे मस्जिद की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। मस्जिद का गेट भी बेहद शानदार टाइल्स से सुसज्जित है। गेट पर मस्जिद में अंदर जाने की दुआ लिखी हुई हैं। मदीना मस्जिद रेती के इमाम मौलाना अब्दुल्लाह बरकाती करीब 19 सालों से अपनी सेवाएं देते चले आ रहे है। इमाम व मोअज्जिन के लिए दो कमरे भी बनें हैं। मस्जिद में पांचों वक्त की नमाज के अलावा जुमा, अलविदा, ईदुल फित्र व ईदुल अजहा की नमाज अदा की जाती है। इस दौरान काफी भीड़ होती है। मस्जिद के बाहर सड़क पर भी सफें लगानी पड़ती हैं।

मीर कटीले पांच हजार मुगल फौज के साथ आए और रेती पर बस गए

रेती चौराहा निवासी वरिष्ठ पत्रकार एस.एम. नूरूददीन अपने लेख में लिखते हैं कि उनके दादा हजरत हाजी सैयद बरकतुल्लाह के बड़े भाई सैयद हफीजुल्लाह ने सन् 1857 ई. की पहली जंगे आजादी में हिस्सा लिया था, परंतु अंग्रेजों के हाथों शहीद हो गए। उनका शव करीब दो या तीन दिन तक रेती चौक पर पड़ा रहा वास्तव में अंग्रेज चाहते थे कि उनके परिवार और उनके सबंधियों में से जो भी शव लेने आएगा उसे भी मार दिया जायेगा। इसी वजह से कोई शव लेने नहीं गया। बाद में अंग्रेजों ने उनका शव दफन कर दिया। मगर यह नहीं मालूम हो सका कि उन्हें किस जगह दफन किया गया है। बतातें चले कि पत्रकार नूरूद्दीन के पूर्वज सैयद मीर कटीले सन् 1559 ई. के करीब दिल्ली से आकर गोरखपुर के मौजूदा रेती चौक क्षेत्र में बस गये। उस समय यह क्षेत्र वनाच्छादित था। कुछ दूरी से राप्ती नदी का बहाव था। रेतीली जमीन के कारण ही इसका नाम रेती चौक पड़ गया। सैयद मीर कटीले पांच हजार मुगल फौज के सिपाह सालार थे। मीर कटीले के साथ शाही घराने की एक मूक बधिर शहजादी भी आई थीं। उनका मकबरा बक्शीपुर में बना हुआ है। वर्तमान में उन्हें सदा बेगम के नाम से लोग जानते हैं। मीर कटीले रेती चौक, शेखपुर तथा अलीनगर तक के एक बड़े भू-भाग पर काबिज थे।

दुपट्टा गली का दिलचस्प इतिहास
वरिष्ठ संवाददाता अजय श्रीवास्तव अपने एक लेख में लिखते हैं कि अस्करगंज + रेती पर सन् 1978 ई. से आबाद है दुपट्टा गली। करीब 42 वर्ष पहले कानपुर से रोजगार की तलाश में गोरखपुर पहुंचे गुलाम मोहम्मद के शुरूआती दिन संघर्षों के साथ गुजरे। शहर की गलियों में साइकिल से फेरी लगाकर 2 से 4 रुपये में दुपट्टा बेचने वाले गुलाम मोहम्मद को मदीना मस्जिद के पास सुग्गुन के मकान की दीवार में लकड़ी का पटरा रखने की इजाजत मिलीं तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। गुलाम मोहम्मद की वजह से रेती रोड स्थित मदीना मस्जिद से रेती के पुल की तरफ जाने वाली यह गली अब दुपट्टा गली के नाम से मशहूर है। देवदार की लकड़ी के छह पटरों को दीवार में जोड़कर शुरू हुई दुकानदारी ने गुलाम मोहम्मद की किस्मत बदल दी। अाज दुपट्टा गली के कारोबार में बड़े हिस्से पर गुलाम मोहम्मद व उनके बेटों का कब्जा है। धीरे-धीरे दुपट्टा गली में 50 से अधिक दुकानें गुलजार हो चुकी हैं। दिल्ली, जयपुर और बनारस के दुपट्टों की धूम है। रोज इस गली की दुकानों से पांच हजार से अधिक दुपट्टा बिक जाता है। कभी 2 से 3 रुपया में बिकने वाला दुपट्टा अब 40 से दो हजार रुपया तक बिकता है।

यहां हैं चांदी व तांबे के ताजिया

अस्करगंज स्थित सब्ज इमाम चौक पर जो ताजिया रखा जाता है। वह करीब साठ सालों पुराना है। कई लोगों ने मिलकर इसको बनाया था। सबसे पहले जब ताजिया वजूद में आया, तब वह तांबे का था, वक्त क साथ उसमें बदलाव होता गया। बाद में रांगा और एल्यूमिनियम का हो गया है, हालांकि उसके ढांचे में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया है। रेती रोड पर शिया समुदाय का इमामबाड़ा जहीर साहब मरहूम का मशहूर है। जहीर साहब मरहूम के इमामबाड़े में करीब चार फीट ऊंची व ढ़ाई फीट चौड़ी तीन चांदी की ताजियां भी है।

अस्करगंज के हाजी बारकल्लाह ताले वाले मशहूर शख्सियत थे

अस्करगंज के हाजी बारकल्लाह ताले वाले मरहूम यहां की मशहूर शख्सियत थे। सर से पैर तक हरा लिबास पहनते थे, यही इनकी पहचान थी। ताले के बहुत उम्दा कारीगर थे। 6 अगस्त सन् 2016 ई. को उनका इंतकाल हो गया। हर तरह का ताले, तिजोरी, गाड़ियों के ताले चंद मिनट में ठीक कर देने वाले मरहूम बारकल्लाह ने पूरी ज़िंदगी की कमाई सामाजिक कार्यों में लगा दी। शहर में ताला-चाभी का जब-जब जिक्र होगा। इनका नाम जरूर आयेगा। रेती पुल पर इनकी छोटी से दुकान थी, अब भी है। मशरिकी वेलफेयर सोसाइटी में नुमाया किरदार अदा किया। घोसीपुरवा में मदरसा मजहरुल उलूम खुलवाने में महती भूमिका निभायीं। छोटे काजीपुर में निकाह घर कायम कराने में अहम किरदार अदा किया। लड़कियों की तालीम के लिए इलाहीबाग में आमना गर्ल्स स्कूल खुलवाने में भी योगदान दिया।

‘पकवान’ होटल में सजती है शायरों की महफिल

रेती चौक से सटे अस्करगंज की एक गली में 15 अगस्त 1991 ई. को ‘पकवान होटल’ मोहम्मद अनवर ज्य़ा ने खोला। यहां मटन-चिकन की शानदार ब्रियानी मिलती है और साथ में चाय भी। यहां एक जमाने से शायरों का जमावड़ा लगता चला आ रहा है। अनवर ज़्या खुद भी शायराना मिजाज रखते हैं। इसके अलावा यहां जफर व कलीम होटल और कवाब पराठे के कई मशूहर होटल हैं। जहां का खानपान लाजवाब है। यहीं पास में अलहेरा मुस्लिम मुसाफिर खाना भी हैं। कुछ दूर पर सांध्य हिन्दी दैनिक अखबार का दफ्तर है। मदीना मस्जिद के सामने की बिल्डिंग पिंडारी बिल्डिंग है। जहां तारीख का अहम हिस्सा बने पिंडारी सरदारों के खानदान के लोग रहते हैं।

प्रस्तुति: सैयद फरहान अहमद

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *