गोरखपुर

इमाम हुसैन कल भी ज़िंदा थे, आज भी ज़िंदा हैं: आलिमा महजबीन

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  • एक दर्जन से अधिक जगहों पर जारी ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’

गोरखपुर। शनिवार ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ महफिलों के नाम रहा। उलमा किराम ने दीन-ए-इस्लाम, शहादत और कर्बला के बाबत विस्तार से बयान किया। सातवीं मुहर्रम को करीब एक दर्जन से अधिक मस्जिदों में ‘जिक्रे शोह-दाए-कर्बला’ महफिलों का दौर जारी रहा। मुहर्रम की सातवीं तारीख़ को जालिम यजीदियों ने हज़रत इमाम हुसैन व उनके साथियों के लिए पानी पर रोक लगा दी थी। कर्बला का वाकया सुनकर अकीदतमंद इमाम हुसैन की याद में डूब गए।

सातवीं मुहर्रम के दिन से शहर में मुहर्रम के जुलूसों का सिलसिला भी तेज हो गया। जुलूस का केंद्र नखास रहा। अलीनगर, बड़े काजीपुर, हुमायूंपुर, अजयनगर, गोरखनाथ, रसूलपुर, दशहरीबाद, नथमलपुर, जमुनहिया बाग, शाह मारूफ, जाफरा बाजार, बहरामपुर, घोसीपुरवा, बख्तियार, छोटे काजीपुर, मियां बाजार, शाहपुर, बड़गो, बनकटी चक, बेनीगंज, हाल्सीगंज आदि तमाम इमाम चौकों से जुलूस निकाले गए। ये सभी जुलूस अपने परंपरागत रास्तों से गुजरकर फिर इमाम चौक पर आकर समाप्त हुए। जुलूस में नौजवानों ने करतब भी दिखाए। रौशन चौकी, चिंडोल, सद्दे, ऊंट, घोड़े, बैंड और अलम जुलूस की शोभा बढ़ा रहे थे। मियां बाज़ार स्थित इमामबाड़ा में मियां साहब ने अपने हमराहियों के साथ गश्त किया। इमामबाड़े में मेला अपने शबाब पर है।

मदरसा जामिया कादरिया तजवीदुल क़ुरआन लिल बनात अलहदादपुर में महिलाओं की महफ़िल हुई। जिसमें कारिया गजाला फातिमा, कारिया नाजमीन फातिमा, आलिमा महजबीन खान सुल्तानी ने कहा कि कर्बला के मैदान में हज़रत फातिमा के दुलारे इमाम हुसैन जैसे ही फर्शे जमीन पर आए कायनात का सीना दहल गया। इमामे हुसैन को कर्बला के तपते हुए रेगिस्तान पर दीन-ए-इस्लाम की हिफाजत के लिए तीन दिन व रात भूखा प्यासा रहना पड़ा। अपने भतीजे हज़रत कासिम की लाश उठानी पड़ी। हज़रत जैनब के लाल का गम बर्दाश्त करना पड़ा। छह माह के नन्हें हज़रत अली असगर की सूखी जुबान देखनी पड़ी। हज़रत अली अकबर की जवानी को खाक व खून में देखना पड़ा। हज़रत अब्बास अलमबदार के कटे बाजू देखने पड़े, फिर भी हज़रत इमाम हुसैन ने दीन-ए-इस्लाम को बुलंद करने के लिए सब्र का दामन नहीं छोड़ा। इमाम हुसैन कल भी ज़िंदा थे, आज भी ज़िंदा हैं और सुबह कयामत तक ज़िंदा रहेंगे। हुसैन ज़िंदा हैं हमारी महफ़िल में, हुसैन ज़िंदा हैं हमारी नमाज़ों में, हुसैन ज़िंदा हैं हमारी अज़ानों में, हुसैन ज़िंदा हैं हमारी सुबह में, हमारी शामों में। कत्ले हुसैन असल में मरगे यजीद है, इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद।

गाजी मस्जिद गाजी रौजा में मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी, मौलाना रियाजुद्दीन क़ादरी, हाफिज रहमत अली, हाफिज रेयाज, कारी सरफुद्दीन ने कहा कि कर्बला के 72 शहीदों ने जो बेमिसाल काम किया, उसकी मिसाल दुनिया में नहीं मिलती है। आले रसूल की मुहब्बत हमारा ईमान है।

बेनीगंज ईदगाह रोड मस्जिद में कारी मो. शाबान बरकाती ने कहा कि आशूरा मुहर्रम की रात खत्म हुई और दसवीं मुहर्रम सन् 61 हिजरी की कयामत नुमा सुबह नमूदार हुई। इमाम हुसैन के अहले बैत व जांनिसार एक-एक कर शहीद हो गए और दीन-ए-इस्लाम का परचम बुलंद कर गए। हज़रत इमाम जैनुल आबिदीन, हज़रत उमर बिन हसन, मोहम्मद बिन उमर बिन अली और दूसरे कम उम्र साहबजादे कैदी बनाए गए। हज़रत सकीना, हज़रत जैनब हज़रत इमाम हुसैन की सगी बहन व पत्नी शहरबानो व दूसरे अहले बैत हजरात की बीवियां भी कैदी बनाई गईं। इन पर बहुत जुल्म किया गया लेकिन सभी ने सब्र का दामन थामें रखा।

मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में नायब काजी मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने बताया कि इमाम हुसैन के साथ मक्का शरीफ से इराक की जानिब सफर करने वालों में आपके तीन पुत्र हज़रत अली औसत (इमाम जैनुल आबेदीन), हज़रत अली अकबर, 6 माह के हज़रत अली असगर शामिल थे। इमाम हुसैन के काफिले में कुल 91 लोग थे। जिसमें 19 अहले बैते किराम (पैग़ंबरे इस्लाम के घराने वाले) और अन्य 72 जांनिसार थे।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में मौलाना मो. असलम रज़वी ने कहा कि पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अपनी औलाद को तीन बातें सिखाओ। अपने पैग़ंबर की उल्फत व मुहब्बत। अहले बैत (पैग़ंबर के घराने वाले) की उल्फत व मुहब्बत। क़ुरआने करीम की किरात। जब तक मुसलमानें के हाथों में क़ुरआन और अहले बैत का दामन रहा वह कभी गुमराह और रुसवा नहीं हुए बल्कि हमेशा फतह उनके कदम चूमती रही लेकिन जैसे ही मुसलमानों ने उन दोनों के दामन से दूरी बनाई हर जगह जिल्लत व रुसवाई उनके सामने आती चली गई। लिहाजा आज भी अगर हम क़ुरआन व अहले बैत से ताल्लुक जोड़ लें तो कामयाबी हमारे कदम चूमेगी।

मरकजी मदीना जामा मस्जिद रेती चौक में मुफ्ती मेराज अहमद क़ादरी ने कहा कि पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने मेरे अहले बैत से बुग्ज (जलन) रखा अल्लाह उसको दोजख में डालेगा। एक जगह इरशाद फरमाया जो लोग हौजे कौसर पर पहले आएंगे वह मेरे अहले बैत होंगे।

जामा मस्जिद रसूलपुर में मौलाना जहांगीर अहमद अजीजी ने कहा कि पैग़ंबर-ए-आज़म ने इरशाद फरमाया कि अगर तुम हिदायत चाहते हो और गुमराही और जलालत से अपने आपको दूर रखना चाहते हो तो अहले बैत का दामन थाम लो। अंत में सलातो सलाम पढ़कर मुल्क में अमनो अमान व तरक्की की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई।

वहीं बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर के निकट शनिवार को तीसरी बार अकीदतमंदों में लंगर-ए-हुसैनी बांटा गया। मौलाना अली अहमद ने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन ने मुल्क या हुकूमत के लिए जंग नहीं की, बल्कि वह इंसानों के सोये हुए जेहन को जगाने आए थे। उनके कुनबे में शामिल बुढ़े, जवान, बच्चे और महिलाओं ने खुद पर जुल्म सहन कर लिया लेकिन पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दीन-ए-इस्लाम को जालिम यजीद से बचा लिया। आलमे इस्लाम को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि हक़ और बातिल के बीच हुई जंग में कर्बला के शहीदों ने जो जीत हासिल की वह कयामत तक कायम रहेगी। लंगर बांटने में अली गजनफर शाह, बब्लू कुरैशी, आजाद, आसिफ, कासिम, आरिफ, शहजादे, अली अशहर, सैफ, अनस, सद्दाम, सैफी, चंदू, अर्शियान, जान मोहम्मद आदि ने महती भूमिका निभाई। गौसे आज़म फाउंडेशन ने हुसैनी लस्सी बांटी।

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