शिक्षा

मुसलमान हो कर इल्म से दुरी

लेखक:साबिर इसमाइली कादरी
अनुवादक:मुशताक अहमद बरकाती अनवारी, पोकरण


जिस तरह दुसरी बातों में दीने इसलाम को ऐक अलग मकाम हासिल इसी तरह इलम हासिल करने के बाब में भी इसलाम का नाम सबसे पहले आता है, इसलाम की आमद से पहले इलम हासिल करने पर कोई खास तवज्जोह नहीं दी जाती थी, दुनिया में इस्लाम का सूरज चमकने से पहले इल्म के महल में तारीकी छाई हुई थी, हासिल करने को एक खास तबके का काम समझा जाता था मुख्तलिफ मजाहिब उलमा ही इलम हासिल करने के पाबनद थे और यह जिहालत भरी पाबंदियां उन पर लागू कर दी जाती थी,
ऐक मिसाल
हिंदुओं को देखें तो उनमें शोदर को वेद पढ़ने की इजाजत नहीं थी और अगर कोई शोदर वेद पढ़ता पकड़ा जाता तो तो उसे सजा दी जाती थी,जैसा कि अबु रैहान अलबैरूनी ने तहकीक मा लिलहिनद में लिखा है, और अब मैं जब इसलाम आया तो सिर्फ 17 अट्ठारह लोग लिखना पढ़ना जानते थे,जिन में हज़रत उमर फारूक आज़म ؓभी शामिल हैं
इन बातों को बयान करने का सिर्फ यह मकसद है कि इलम को कोई खास अहमियत हासिल नहीं थी और बहुत कम लोग ऐसे थे जो राहे इलम के मुसाफिर थे।

इसलाम में मुसावात
इसलाम ने छोटे बड़े काले गोरे और कबायली शराफत के झगड़े को इस तरह खत्म किया कि किसी को किसी पर कोई फजीलत ना दी बल्कि सबको आदम अलैहिस सलाम की औलाद होने का याद दिलाया, अगर फज़िलत दी तो इलम और तक़वे की बनियाद पर इस का नतीजा ये निकला कि ऐक गुलाम काबे की छत पर चढ़कर आज़ान देने लगा,
जिसे कुफफारे मक्का अपनी मजलिस में बैठाना बाय से शर्म समझते थे, एक गुलाम जिसके साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जाता था उसे जयादा इलम होने की वजह से से उसका मालिक उसे अपने आगे इमाम बनाने लगा, और खुद उसका उसका मुकतदी बन गया दुनिया ने यह मनज़र देखा जो गुलाम थे वोह बादशाहों के इमाम बन गए और किसी को माल या नसब की फज़ीलत न दी गई।

मुसलमान हो कर इलम से दुरी
मुसलमानो हो कर कोई इलम से दूर हो तो इसका यही मतलब है कि उसने इस्लाम को जाना ही नहीं कयोंकि यह वोह दीन है जिस ने इलम की वजह से एक जवान को बुढ़े पर फज़ीलत दी।
अहले इल्म को आलमे इस्लाम का मरकज बनाया है अल्लाह पाक ने इलम की तरगीब पर कई आयतें नाजिल फरमाई है और जहल की मुजममत साफ अल्फाज़ में बयान फरमाई है
ये इस्लाम की आमद की बरकत थी कि दुनिया ने इलम की अहमियत को जाना और आज वोह इलम का परचम उठाने वाले मशहूर हो गए इससे पहले वो खुद गुमराही के गड़े में थे,इसलाम की गोद में पलने वाले उलमा ने दुनिया को वोह हुनर सिखाए जो वोह सोच भी नहीं सकते थे मुसलमानों की इलम से दूरी ही इनहें यह जानने से रोकती है कि इन से पहले वालों दुनिया को क्या कया कारनामा करके दिखाऐ हैं, आज अगर चे दाढ़ी टोपी देख कर हमें कम इलम वाला समझा जाता है लेकिन ऐक वक्त में ये कौम इलम से पहचानी जाती थी।

दीनी और दुनियावी इलम
इल्म को आम लफजों में दो हिस्सों में तकसीम किया जाता है एक दिनी इलम और दूसरा दुनियावी इलम, दोनों ही जरूरी हैं, इसे यों कहना बेहतर होगा के दिनी उलुम के साथ साथ दुनियावी उलूम भी जरूरी हैं कुछ लोग इसे इस तरह कहते हैं कि दुनियावी उलूम के साथ-साथ दीनी उलुम भी जरूरी हैं जो के सही नहीं है, इन में फरक है कि पहले दीनी उलूम ज़रूरी हैं फिर इसके साथ
साथ दुनियावी उलुम भी जरुरी हैं, दुनियावी उलूम को पहले रखने से यह संदेश जाता है कि दीनी उलुम बाद में हैं दुनियावी उलूम पहले अगर दीनी उलुम हों और दुनियावी उलुम सबके पास हो तो भी काम चल सकता है लेकिन अगर दीनी उलुम की कमी हो तो काम नहीं बनेगा।

किफायत
दीनी उलुम सबके पास होना जरूरी है क्योंकि यही आपको ताकत देता है जिससे आप दुनियावी उलूम को संभाल सकते हैं वरना दुनियावी उलुम आपको तबाही की तरफ भी ले जा सकते हैं जब सब के पास दीनी उलुम हो तो फिर दुनियावी उलुम के लिए हर शख्स को तकलीफ उठाने की जरुरत नहीं बल्कि कुछ का महारत हासिल करना सब को किफायत करेगा।
मिसाल के तौर पर गज़वातुननबीﷺ का इलम होना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है, लेकिन लड़ने के लिए हथियार की जरूरत होगी और मौजूदा दौर में तकनीकी तरक्की उरूज पर है।
लिहाजा अब हथियार बनाने में महारत की भी जरुरत है वरना मुकाबले में हथियार कहां से आ सकते हैं इस्के लिए एक टीम को इंजीनियर बनाना होगा और वोह सबको किफायत करेगा।
एक शक्स डॉक्टर बन जाए तो पूरे मोहल्ले को काफी हो सकता है और हर आदमी को अपने इलाज के लिए डॉक्टर बनने की जरूरत नहीं लेकिन दिनी उलुम हर आदमी पर हासिल करना फरज़ है ताकिे अपने अक़ाइद और इबादात को सहीह कर सके

मुसलमानों को इल्म की तरफ लाया जाए
मुसलमानों को इल्म की तरफ ले जाने के लिए उन्हें एक झंडे तले लाना जरुरी है, अगर हर आदमी अपनी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जो चाहेगा वह करेगा तो ताकत कई हिस्सों में बट जाएगी होना ये चाहिए कि किसी इलाके के तलबा को बाकायदा एक सिस्टम के हिसाब से राहे इल्म का मुसाफिर बनाया जाए अगर दो-तीन लोग इंजीनियर बन रहे हैं तो सबको इसी लाइन में ले जाकर खड़ा कर देना पैसों की बर्बादी के साथ-साथ वक्त को ज़ाए करना है और अपनी नस्लों के भविष्य के साथ खेलना है कुछ लोग डॉक्टर बनें कुछ इंजीनियर बनें कुछ मकान तामीर करने के अलग अलग उलुम पर महारत हासिल करें ,कुछ अंग्रेजी सीखें, कुछ तकनीकी कामों में माहिर बनें फिर ऐक सिस्टम के तहत अपने ही इलाके में एक दूसरे की मददगार बनें इस से मुसलमानों को इल्म के करीब भी लाया जा सकता है और उलूम को एक जगह जमा करके इससे फायदा भी उठाया जा सकता है।

हमारे उलुम की खेती
अगर मैदान ए इल्म में मुनजजम होकर तरीके से काम शुरू कर दें तो हमारे हासिल कीऐ उलूम की खेती से हमारी नस्लें सैराब होंगी और उन्हें किसी गैल की जूतियां सीधी करने की जरुरत नहीं पड़ेगी, मुसलमानों की एक बड़ी संख्या अंग्रेजी कंप्यूटर और अलग-अलग उलूम को सीखने के लिए काफिर की मोहताज है तू क्या ही अच्छा होता यह सब हमारे पास होता, जिन मुसलमानों के बच्चे काफिरों के स्कूल या कॉलेज में ना पढ़कर मुसलमानों के स्कूल में पढ़ते हैं वोह भी कम अज़ कम काफिरों के सिसटम के गुलाम है क्योंकि अगर चे स्कूल मुसलमानों का है लेकिन इसमें तालीम का निसाब वही है जो कुफार का है फिर उसमें और इसमें बहुत ज्यादा फरक बाकी नहीं रहा।
उलमाऐ किर और कौम के मोजिज लोगों की अवाम बात सुनती है उलमा और बा वकार लोगों को चाहिए आगे आऐं दीनी मदारिस के साथ स्कुल चलाऐं और हर सहुलत फराहम करें जो स्कुल में होती है फीस थोड़ी कम रखें लेकिन सहुलत जयादा दें ।बगैर चंदे के भी काम हो सकता है बस सिसटम ज़रूरी है इस के इलावा कॉलेज और और युनवरसिटीयां भी ज़रूरी हैं जहां असरी उलुम पर दसतरस हासिल हो सके ये सब मुमकिन है बस मेहनत की ज़रूरत है,अल्लाह पाक इस की तौफीक अता फरमाए-

शोऐब रज़ा

विश्व प्रसिद्ध वेब पोर्टल हमारी आवाज़ के संस्थापक और निदेशक श्री मौलाना मोहम्मद शोऐब रज़ा साहब हैं, जो गोरखपुर (यूपी) के सबसे पुराने शहर गोला बाजार से ताल्लुक रखते हैं। वे एक सफल वेब डिजाइनर भी हैं। हमारी आवाज़

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