जीवन चरित्र

पुर कशिश अंदाज़ का शायर: ज़की तारिक़ बाराबंकवी

अदब और समाज का हमेशा से गहरा रिश्ता रहा है। एक अच्छे शायर और अदीब की नजरें हमेशा ही समाज के उतार-चढ़ाव और नाहमवारियों पर होती हैं। एक शायर या अदीब समाज के लिए वही काम करता है, जो एक तबीब बीमार के लिए करता है। अच्छी शायरी इंसान के थके हुए दिमाग को राहत बख़्शती है। एक अच्छे शायर की तख़लीक़ ऐसी होती है, जहाँ फिक्र ओ फ़न के खुशनुमा, खुशरंग, और खुशबू बिखेरने वाले फूल खिल कर अपने रंग ओ बू से अदबयात का ऐसा गुलिस्तान बना देते हैं जो अपनी दिलकशी और सिहरकारी से हर साहिबे जॉक़ को अपनी तरफ मुतवज्जो करता रहता है।
मिली है वक्त से जिनको कदम कदम गुरबत
वो धूप पीते हैं और आफताब खाते हैं
यूं रुए माह पे बलखा रही है जुल्फे सियह
खिली है धूप भी बादल भी छाए जाते हैं
हयात उनकी अंधेरों में बितती है ज़की
जो अपने होठों पे सूरज बहुत उगाते हैं
बाराबंकी के कस्बा सहादतगंज की सर ज़मीन पर ऐसा ही एक नाम है जो इन दिनों सबकी जुबान पर है जिसकी शायरी का नशा हर किसी के दिलों दिमाग पर छाया हुआ है। यह वह नाम है जो किसी तार्रुफ़ का मोहताज नहीं। जनाब ज़की तारिक़ साहब अपनी शायरी की वजह से शायरी के आसमान पर पहुंच चुके हैं। इन्होंने शायरी के इबतेदाई दौड़ में तारीक अंसारी साहब से इसलाह ली, और आज भी उन्हीं को अपना उस्ताद मानते हैं जिसका ऐतराफ़ उन्होंने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में कुछ इस तरह किया है :-
बहुत लतीफ बहुत मोहतरम है वो यादें
हम इत्तेफाक समझकर जिन्हें भुलाते हैं
वो तेरे मेहमां हुए हैं निसार हो उन पर
ये दिन हयात में कब बार बार आते हैं
बेशक ऐसे दिन बार-बार नहीं आते हैं जब हम किसी बुजुर्ग के पहलू में बैठकर इल्म ओ हुनर के जाम पीते हैं।
आजकल हिंदुस्तान और बैरूने ममालिक से साय होने वाले अक्सर ओ बेशतर अखबारात ओ रसायल में इनके गीत, ग़ज़ल, नात, हम्द, मनकबत, कव्वाली, देशभक्ति गीत, कितात और रूबाई साय हो रहे हैं। ज़की तारिक साहब के कलाम कई हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी रिसालो में भी साय हो रहे हैं। ज़की तारीक़ कारवाने ग़ज़ल का सदियों का तवील सफर बड़ी कामयाबी और कामरानी के साथ तय कर चुके हैं। इस राहे शेर ओ अदब में मुतक़दमीन ने ऐसे हसीन नक्श ओ निगार बनाए और नकूशे कदम छोड़े हैं जो चांद सितारों की तरह जहाने शेरों अदब में हमेशा रोशनी देते रहे हैं जकी तारीक़ का नाम भी उन्हीं में शामिल है।
मेरे गिर्द इक मजमा ए दोस्ताँ था
मगर जुस्तजू जिसकी थी वह कहां था
उसे थे सफर के सब आदाब अजबर
वो तन्हा बजाते खुद इक कारवां था
ग़ज़ल फूल की पंखुड़ी की तरह नाजुक और नर्म एहसासात और जज़्बात की तर्जुमान होती है। दोशे हवा पर उड़ने वाले बेमिस्ल गुल हाय ग़ज़ल की मुखलिस और मॉतबर सफीर बनकर दिलो-दिमाग को जो फरहत अता करती है वह अपने आप में एक जवाब होती है।
चांद सी फूल सी सबा सी है
जान तू नियमत ए खुदा सी है
तुझ से मिलते ही दिल को चैन आया
ये मुलाकात तो दवा सी है
फितरत ए आफताब ऐ जाना
हुबहू बस तेरी अदा सी
एक बार की बात है हुआ यूं कि मैं एक मुशायरा में शिरकत करने लखनऊ गया, जहां मेरी मुलाकात जनाब ज़की तारिक साहब से हुई। जहां इन्होंने मुझे अपनी डायरी दिखाई मैंने डायरी खोलकर देखना शुरू किया तो सबसे पहले हम्द बारी ताआला, फिर नात पाक, सलाम, मरसिया, कव्वाली, देश गीत और तब ग़ज़ल पर नजर पड़ी ऐसा लगा कि मैंने जकी तारीक की पूरी हयात शायरी एक ही नजर में पढ़ ली। मुशायरा खत्म होने के बाद जकी तारीक साहब मुझे अपने घर ले गए जहां मेरी मुलाकात उनके बड़े लड़के जनाब अबु शहमा अंसारी से हुई मैं यहां पर उनका जिक्र जरूरी समझता हूं इसलिए कि वह ना तो शायर हैं और ना अदीब फिर भी वह एक बहुत बड़े अदब नवाज हैं और दिन रात अदब की खिदमत में लगे रहते हैं जनाब अबू सहमा अंसारी साहब अपने वालिद की गजलें और तख़लिक़ात को तमाम अखबारों और रिसालों तक पहुंचाते रहते हैं। रफ्ता रफ्ता उनका यह शौक और बढ़ता गया फिर उन्होंने अपने वालिद के साथ-साथ दूसरे शायरों अदीबों की खिदमत भी करनी शुरू कर दी बहुत से ऐसे भी फनकार हैं जो मौजूदा दौर के डिजिटल तकनीक वाकफियत नहीं रखते हैं जिसकी वजह से अखबार और रसायल में राब्ता करना उनके लिए नामुमकिन सा काम है लेकिन जनाब अबू सहमा अंसारी साहब ने उनके इस नामुमकिन को मुमकिन बनाया है उन्होंने अपने ईमेल आईडी से उन तमाम लोगों की तख़लिक़ात को अखबारों में भेजना शुरू किया फिर किसकी तखलिकात किस अखबार में और किस दिन को साय हुई उसका भी अक्स उन लोगों तक भेजते रहते हैं अदब के लिए सचमुच यह बहुत बड़ा काम है ऐसा कोई दिन नहीं कि दो या तीन बार उनका फोन मेरे पास नहीं आता हो उधर पिछले महीने की बात है कि फोन पर उन्होंने ख्वाहिश जाहिर की कि एक ऐसी ईमेल आईडी बनाई जाए जिससे सिर्फ दूसरे शोअरा और अदीबों की तख़लिक़ात को उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए वह चाहते थे कि मैं इसके लिए कोई अच्छा सा नाम तज़वीज़ करूँ मेरे ध्यान दें एकदम से आया अदब दोस्त और अगले ही दिन आदब दोस्त नाम की ईमेल आईडी बन गई अब इसी e-mail आईडी से तमाम शोअरा और अदीबों की ग़ज़लें और तख़लिक़ात सभी अखबारों रसायलन में भेजी जाती हैं और इस काम को हमारे अदब दोस्त जनाब अबू सहमा अंसारी बड़े ही शौक से अंजाम दे रहे हैं इतने बड़े अदब नवाज और अदब दोस्त को मेरा सौ सौ सलाम!
सर जमीन ए बाराबंकी के कस्बा सहादतगंज का दरख्शिंदा सितारा ज़की तारिक़ उर्दू शायरी में जिन असनाफ़े सुख़न का एहतराम वाजिब है उनमें हम्द, नात पाक और सलाम तीनों असनाफ़े शायरी शामिल है। ये तीनों असनाफ़ इतने मुकद्दस हैं कि इनके मुतअल्लिक़ मनफ़ी अंदाज में रायज़नी की ही नहीं जा सकती। यहां बुजुर्गों और कोहना मश्क़ शोअरा किराम के कलाम का तो सवाल ही नहीं, अगर फन ए शायरी नशेब ओ फ़िराज़ और पेच ओ ख़म से बिल्कुल नावाकिफ़ शोअरा भी इन असनाफ में तबआ आजमाई करें तो गुमान ग़ालिब ये है कि उनकी तख़लिक़ात मुरव्विजा पैमाने पर कभी पूरी नहीं उतरेगी लेकिन मेरा मानना यह है कि ऐसी तख़लिक़ात पर भी किसी हाल में उंगली नहीं उठाई जा सकती है सबब यह है कि हरगिज ना देखा जाएगा कि मिद्दाह कौन है, देखा सिर्फ यह जाएगा कि इन मुकद्दस तख़लिक़ात में ममदूह कौन है, सिर्फ तक़रीज़ है और बस!
बुला लो मुझको मदीना मेरे रसूले करीम
हूँ बेकरार बहुत शहरे दिलरुबा के लिए
अदा जो कर सके हक आपकी फजीलत का
कहां से लाए वो अल्फाज हम सना के लिए
जकी अकीदा ओ मसलक का जिक्र क्या है भला
ये जान ओ दिल मेरे कुरबाँ है मुस्तफ़ा के लिए
जकी तारिक़ कोहना मश्क शायर हैं।ये उनफ़ुआने शबाब ही से मश्क़े सुख़न करने लगे थे इस वक्त अपने असल वतन सआदतगंजमें ही क़्याम पजेर हैं। गांव के ही श्री गांधी पंचायत इंटर कॉलेज में दरस ओ तदरेस का काम बखूबी अंजाम दे रहे हैं और वो शेर ओ अदब की दरमियानी मंजिलें तय करके अदबी हवाले से मारूफ़ शोअरा की फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं। इनके अंदर वतन परस्ती का जज्बा कूट-कूट कर भरा हुआ है।
विकास सभ्यता की और तरक्क़ीओं की डोड़ में
जमाने भर के देशों को पछाड़ता मेरा वतन
कबूल करले ए खुदा जकी की इतनी सी दुआ
कि ऐसी ही रहे सदा हरा भरा मेरा वतन
दीन ओ मज़हब और ज़बां की ये लड़ाई किस लिए
कुछ तो अपने आप में गंभीरता पैदा करो
देखना है मुल्क में तुमको अगर सुख शांति
अपने दिल में एकता की भावना पैदा करो
समाज की बुराइयों पर यह हमेशा ही जरब लगाते रहते हैं इनकी शायरी में इसकी मिसाल हर कहीं देखी जा सकती है।
सच है वो मुझसे बद गुमां है मगर
आप क्यों दरमियां में हायल हैं
और ये भी कि—
तेग़ ओ खंजर का मसला ही नहीं
यानी हम बर्गे गुल से घायल हैं
कोई छुता ना पूछता है हमें
जैसे उर्दू के हम रसायल हैं
मुझको कातिल कहा बजा लेकिन
आपके पास क्या दलआयल हैं
और फिर आखिरकार शायर इन बुराइयों से हार जाता है और फिर कहता है कि
हम बहर हाल इस के कायल हैं
जिंदगी है तो फिर मसायल हैं
जमाना आज तक कभी एक रवीश पर नहीं चला,ख़्वाह हालात इसके लिए पैदा किए जाएं या खुद-ब-खुद पैदा हो जाए लेकिन इंकलाब जमाना का मुकद्दर बन चुका है, जो कल था वह आज नहीं है जो आज है वह कल नहीं रहेगा। हर सुबह तलू होने वाले सूरज की किरण पैगाम नौ ब नौ लाती है हर दौड़ का आदमी इन तब्दीलियों की इफ़ादियत का या तो ऐतराफ़ करता है या फिर इनहराफ़। आम आदमी के निस्बत फनकार हमेशा बहुत ज्यादा हहस्सास रहा है ।आज भी फ़नकार के मिजाज में तब्दीली नहीं आई है। ऐतराफ़ या इनहराफ़ और रद्द ओ कबूल का यही इंसानी रवैया फनकार के लिए मोहररिक बन जाता है। वह अपने गिर्द ओ पेश का मुशाहिदा करता है इस मुशाहिदे के नतीजे में उसका फन करवटे लेता है, उसके दिलो-दिमाग में लतीफ ऐहसासात की घनघोर घटायें छा जाती हैं।सिद्दते इज़हार की कोख से जन्म लेने वाली सर्द हवाओं से छेड़छाड़ की बिना पर लफ्जों मानी से बोझिल यही घटाएं जब टूट कर बरसती हैं तो वजदानी कैफियात के ऐसे हसीन धारे बह निकलते हैं जिसमें कहकशा के तमाम रंगों का बेहतरीन अक्स सरापा ग़ज़ल में ढल जाता है।ये तख़लिक़ी मंजर नामा समआयत और किरअत दोनों लिहाज से ऐसा पुर कशिश होता है कि सामयिन और क़ारयिन झूम झूम उठते हैं।
किसी की तलून मिजाजी के सदके
नशेमन कफ़स था कफ़स आशियां था
मुझे मिल ना पाया यक़ीं का उजाला
मैं ऐसा गिरफ्तारे वहम ओ गुमां था
थी शब ख्वाब परवर तो दिन पुर तजस्सुस
खोशा जब मेरा जज्बा ए दिल जवां था
जनाब ही तो हमारे शेरों में लफ्ज़ बन बन के ढल रहे हैं
कि शाने नगमा कभी रहे और कभी तो जाने गजल रहे हैं
नवाज कर अपने कुर्ब की रुत बचाले मिटने से आ खुदारा
तेरे ग़मे हिजर में ऐ जानां हम अंदर अंदर ही गल रहे हैं
मैं जिंदगी के अटूट रिश्ता में बांधना चाहता हूं उनको
मगर वह लम्हा ब लम्हा मुट्ठी के रेत जैसे फिसल रहे हैं
खुदा ने तुझको अता किया है ऐ जानां हुस्न ओ शबाब ऐसा
कि मैं तन्हा नहीं तुझे देख कर सभी हाथ मल रहे हैं
तुम्हारी दुनिया नई नई है सुनाओ तुम सब कहानी अपनी
हैं आज भी हाल है वैसे मेरे ए दोस्तों जैसे कल रहे हैं
ये अदबी मंजर नामा सिर्फ जकी तारिक़ की जाति कहानी नहीं है बल्कि हदीसे दीगरां का रूप भी इख्तियार कर लेता है जकी तारिक़ की निगाहें तख़यय्युल इंसानी की जज्बात ओ पर अक्सर रहती है जिन्हें क़दरे मुशतरक का लकब दिया जा सकता है , वह बुनियादी तौर पर कलासीकी और रवायती शायर हैं। दुनिया ए शेरो शायरी में रवायत सीकनी उनके लिए अदबी कुफ़्र के मुतरादीफ़ है, इसलिए उनके कलाम में वही अलामात, वही तशबिहात, वही रक्स, जाम ओ मय ओ लब रुखसार के तज़किरे मिलते हैं जो उनके फ़नकराना हाल को ग़ज़ल के माजी से जोड़ते हैं। उनके कलाम में एक खुशगवार इजाफा ये भी है कि वह हाल के व्हशतनाक चकराता अंधेरों को रुपहले लव लफ़्ज ओ मानी के दिलनशी इस्तेमाल से तश्त अज बाम कर देते हैं उनकी कुहना मुश्की काबिले कद्र फनकाराना सलाहियत है।
संगदिल मोम हो गया ऐ दोस्त
दास्तां वो सुना गए आंसू
लाख कोशिश की मुस्कुराने की
उन को देखा कि आ गए आंसू
यूँ तो शबनम थे देखने में जक़ी
मेरा दामन जला गए आंसू
ज़की तारिक़ की ग़ज़लयात में बड़ा दिल फरेब, दिलकश और खुश रंग तख़लिक़ी जहान अबाद है। संजीदगी ए बयान उनकी रफीक सफर रहती है।शिरीनी बयान में वह पूरा यकीन रखते हैं और उसे उसी अंदाज से पेश भी करते हैं कि उनके अक्सर अश्आर मीठे चश्मे की तरह रवां दवां नजर आते हैं।ज़की तारिक़ का तर्ज़े अदा आम पुख़्ता गो शायरों से जुदा नहीं है।वो इसी डगर पर रहें हैं जिस राह से पेश रु गुज़र चुके हैं।कहीं वो इसी रहगुज़र में जाज़िब नज़र गुल बूटे बनाकर अपने शायराना वजूद का अहसास दिलाते हैं।ज़की तारिक़ का असलूब इन्हें मुश्किल और पूर् ख़ार वादी से महफूज तरीके से गुजार देता है और नतीजा मैं यह एतराफ़ करना ही पड़ता है कि वह एक काबिल कद्र तख़लीक कार है मौसूफ़ की गजलें पढ़कर और सुनकर एक बार फिर यकीन करना पड़ता है की रवायती शायरी करते हुए भी जकी तारिक साहब ने अपना एक नया नया मकाम बनाया है जहां तक पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं है वो रवायती और जदीद शायरी के बीच में एक पुल की हैसियत रखते हैं।

लेखक: प्रेमनाथ बिस्मिल
बिहार

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