जीवन चरित्र

बुगले/बड़े पीर उर्फ हजरत ताजुद्दीन अताउल्ला रह० का रूहानी मज़ार और इस्लामपुरा टेकरी की फज़ीलत

लेखक: जावेद शाह खजराना

आपको बुगले पीर क्यों कहा जाता है?
इस मजार और धार टेकरी की क्या फजीलत है?

इंदौर के पास आबाद धार शहर एक जमाने में मालवा की राजधानी हुआ करता था। राजा भोज के जमाने में जब 40 बेकसूर सहाबियों को शहीद करके एक कुंए में फेंका गया तब धार की धरती पर इस्लाम फैलाने की जिम्मेदारी शाह और बादशाहों को दी गई। हिंदुस्तान के सुल्तानों जैसे खिलजी और तुगलक ने भी अपने गवर्नर यहां भेजे।

बाद में मांडव के सुल्तानो ने भी पीर~फकीरों की खूब आवभगत की और उन्हें धार/मांडव मे बसने के लिए गांव और जागीरें तक दी। नतीजन दूर~दराज़ से वली अल्लाह धार शहर में आकर इस्लाम फैलाने लगे । धार और मांडव वलियों का गढ़ बन गया । धार/मांडव में पीर~फकीरों की तादात इतनी ज्यादा हो गई कि धार का नाम ही “पीराने धार” पड़ गया।

धार आने वाले बुजुर्गों में चिश्ती और सोहरवर्दी सिलसिले के बुजुर्ग भी शामिल है। ऐसे ही सोहरवर्दी बुजुर्ग है हजरत बुगले पीर या बुगड़े पीर जिनका असली नाम रशीद शेख ताजुद्दीन अताउल्लाह है।
(गुलजारे अबरार पेज 379)।

हजरत बुगले पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह सरकार की दरगाह धार के बस स्टेंड के ठीक पीछे पूरब की तरफ बसी गुलमोहर कॉलोनी से लगी एक टेकरी पर है।
हजरत ताजुद्दीन अताउल्लाह एक दानिशमंद दानिश , पाकीजा अखलाक , जोद तकवा , आला किरदार और साहब~ए~उलूम बुजुर्ग थे। आप अपने जमाने में आलिमों अरबाबे असादत का मरकज थे।

आपकी मजार पर मुगलकालीन खूबसूरत मकबरा बना हुआ है । जिसके चारों तरफ बेहद हसीन 8 आलीशान झरोखे बने है। इन झरोखों से पीराने धार की चारों जानिब निगाहें दौड़ा सकते है। मकबरा अष्टकोणीय और एक ऊंचे चबुतरे पर कायम है। मकबरे के अंदर 2 मजारें हैं। दोनों मजारे करीब बनी है। मगरिबी मजार साईज में ऊंची है । जो इनके दादा हुजूर हजरत काज़ी सआदुल्लाह सरकार की है । हजरत सआदुल्लाह को ही बड़े पीर कहा जाता है , इन्हीं की वजह से ये मुकाम बड़े पीर मकबूल हुआ।

मकबरे से लगा इमली का एक कदीम दरख़्त है जिस पर ढ़ेरों बगुले आकर बैठा करते थे। इन्हीं बुगलों की वजह से लोग इन्हें बुगले पीर फिर बुगड़े पीर पुकारने लगे। लेकिन हकीकत में ये मुकाम बड़े पीर (सआदुल्लाह बड़े पीर) से मशहूर था। बाद में इनके पोते हजरत ताजुद्दीन अताउल्ला सरकार को बगल में मदफून कर दिया जो बुगले पीर से मशहूर हो गए।

इस मुकाम को बड़े पीर इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये मुकाम बहुत से फाजिल और आलिम बुजुर्गों की खानगाह हुआ करती थी। हजरत सआदुल्ला धार और मांडव के सबसे फाज़िल और आलिम बुजुर्ग थे।

हजरत बुगले पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह सरकार ही नहीं बल्कि इनके बाप (हजरत मआरुफ) , दादा (हजरत सआदुल्लाह) , परदादा (काज़ी मेहमूद) सभी मशहूर वली अल्लाह थे और इसी टेकरी पर उनकी खानगाह , मदारिस और मकानात हुआ करते थे।

हजरत सआदुल्लाह मांडव के मशहूर अशरफी महल वाले फारसी मदरसे में शेख~उल~इस्लाम (चांसलर) थे। ये हिंदुस्तान की एकमात्र फारसी यूनिवर्सिटी थी। इसके अलावा हजरत सआदुल्लाह के मुरीद और बेटे भी बाकमाल मशहूर वली अल्लाह थे। हजरत सआदुल्लाह अपने वक्त में काज़ी भी थे।
(बुजुर्गानदीन~ए~मालवा पेज 39)

इनके वालिद हजरत काजी मेहमूद अमझेरा के काजी थे जिन्हें मांडव के सुलतान मेहमूद शाह खिलजी ने 500 बीघा जमीन मौजा गांव मारोल बराह मांगोद बोधवाडा में जागिरी में दी। हजरत मेहमूद नारनोली वाले शेख निजाम सरकार के खलीफा और शेख सुहाबुद्दीन सुहरवर्दी की औलाद से थे। आपका सिलसिला अबुबकर सिद्दीकी से मिलता है।
(गुलजार अबरार)

आपके बुजुर्ग इराक से आकर जौनपुर में बस गए। नवी हिजरी सदी में काज़ी मेहमूद मांडव चले आए। कुछ दिनों धार कयाम किया। जहां हजरत सआअदुल्ला की पैदाईश हुई । अमझेरा में मेहमूद काजी की मजार है।

धार के इस्लामपुरा की इस टेकरी पर हजरत बुगड़े पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह और इनके दादा हुजूर की मजारें हैं। मकबरे के बाहर थोड़ी पीछे उत्तर दिशा में खुले आसमान में जिंदा हाजी मज्जूब रहमतुल्लाह अलैह भी जलवा अफ़रोज़ है। हाजी मज्जूब बुगड़े पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह के वालिद मआरूफ सरकार के मुरीद और बीजा नगर के राजा के बेटे थे। जो बाद में पीर कहलाए।

इस टेकरी से 6 नामी~गिरामी वलियों का ताल्लुक है। जिनमें से 3 यहां मदफून है । सभी 6 वलियों क्रमश हजरत काजी मेहमूद , हजरत सआदुल्लाह , हजरत मआरुफ, बुगड़े पीर उर्फ हजरत ताजुद्दीन , जिंदा हाजी मज्जूब और सद्रजहां उर्फ शरबती बाबा यहां मुकीम थे। इन सभी का जिक्र गुलजार अबरार में मौजूद है।

काजी मेहमूद जो बड़े पीर के वालिद थे। यही रहते थे। दूसरे काजी सादुल्लाह जो बड़े पीर कहलाए। तीसरे आपके बेटे हजरत माआरूफ जो यहां पैदा हुए और मदीना में दफ्न है। चौथे हजरत मारूफ के मुरीद जिंदा हाजी मज्जूब जिनकी मजार टेकरी पर जाली के अंदर है। पांचवे दूसरे मुरीद हजरत शेख सद्रजहां उर्फ शरबती बाबा जिन्होंने बुगले पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह की परवरिश और तरबियत की। आपकी मजार टेकरी के पीछे थोड़ी दूर है। छटे हजरत ताजुद्दीन अताउल्लाह उर्फ बुगड़े पीर जिनका ये मकबरा है। ऐसी रूहानी और आला मुकाम वाली टेकरी है ये लेकिन आजकल बदहाली का शिकार है। आवारा बकरियां मजारों के फूल तक चट कर जाती है। नशाखोर भी यहां डेरा जमाएं बैठे रहते हैं।

हजरत ताजुद्दीन उर्फ बुगड़े पीर की पैदाईश भी अपने बाप दादाओं की तरह धार में हुई ।हिजरी सन 986 (1565 ईस्वी) में आप पैदा हुए। जब आप 12 बरस के थे तब आपके वालिद हजरत मारूफ का इंतकाल मदीना में 998 हिजरी (1577 ईस्वी) में हो गया। बुगले पीर उर्फ ताजुद्दीन अताउल्लाह ने आज से 366 साल पहले सन 1654 ईस्वी में 90 साल की उम्र में दुनिया फानी से रुखसती ली। आपकी मजार पर मांडव के गवर्नर ने मकबरा तामीर करवाया। (बुजुरगाने~दीन~ए मालवा पेज 46)

हजरत ताजुद्दीन अताउल्ला उर्फ बुगड़े पीर के वंशज आजकल इंदौर के आजाद नगर में मकबरा चौक पर अल~फलाह नामी मदरसा चलाते है और इन्ही के बुजुर्ग मौलाना मोइनुल्लाह नदवी लखनवी साहब कुछ बरसों पहले तक हयात थे और नामी शख्सियत थे।

मैं जब भी धार जाता हूं।
कदीम और गुमनाम मजारों की खोज और जियारत करने जरूर निकल जाता हूं। फिर उन्हें ढूंढकर उनकी मालूमात हासिल करके आप दोस्तों की खिदमत में पेश कर देता हूं। जब भी आप धार जाए इन मजारातो की जियारत जरूर करना । क्योंकि इन्हीं बुजुर्गों की नेक कोशिशों और मेहनत से मालवा सूबे में ईमान फैला।

मुझ हकीर से लिखने में कोई गलती हो गई हो तो माफ करना और मेरे लिए दुआ करना।

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